प्रेमचन्द का जीवन परिचय | Biography Of Premchand In Hindi| PremChand Ka Jivan Parichay

हिन्दी कथा साहित्य के कुशल चितेरे मुंशी प्रेमचंद को हिंदी तथा उर्दू भाषा के सर्वकालिक महान लेखकों में से एक माना जाता है । उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य का वह सूरज है जिसकी चमक कभी कम नहीं हो सकती । उनकी कहानियों के पात्र आम जन-जीवन के इतने निकट होते हैं कि उन्हें समाज के हर वर्ग में देखा जा सकता है ।

प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, इन्हें नवाब राय तथा प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। उपन्यास लेखन के क्षेत्र में प्रेमचंद के योगदान को देखते हुए बंगाल के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरदचंद्र चट्टोपाध्याय ने इन्हे उपन्यास सम्राट के नाम से संबोधित किया था । साथ ही इनके प्रसिद्ध साहित्यकार पुत्र अमृत राय ने इन्हें कलम का सिपाही नाम दिया ।

हिंदी साहित्य जगत में अमर उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद को अत्यंत गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। सामाजिक कुरीतियों तथा मानव जीवन के प्रत्येक पहलू को इन्होंने अपनी सशक्त लेखनी द्वारा इतने सजीव और मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया है कि पुस्तक पढ़ते समय पुस्तक के पात्र पाठक की आंखों के आगे किसी चलचित्र की भांति साकार हो उठते हैं।

प्रिय पाठकों ! प्रेमचन्द का जीवन परिचय | Biography of Premchand in Hindi | premchand ka jivan parichay लेख के माध्यम से हम आपको बता रहे हैं कि हिंदी साहित्य के प्रथम उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद भारत के उन महान लेखकों में से थे जिन्होंने अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों, रूढिवादियों एवं शोषणकर्ताओं पर कुठाराघात करके अपने पाठकों को न केवल स्वस्थ मनोरंजन दिया बल्कि सामाजिक बुराइयों के दुष्परिणाम को उजागर करते हुए जड़ से समाप्त करने का संदेश दिया।

 लगभग आधी शताब्दी का समय बीत जाने के बाद भी प्रेमचंद की कथावस्तु का ताना-बाना हम समाज में ठीक वैसा ही पाते हैं । तो चलिए दोस्तों जानते हैं प्रेमचंद कि जीवनी/ कहानी के बारे में –

बिन्दु जानकारी
प्रसिद्ध नाममुंशी प्रेमचंद
अन्य नाम नवाब राय
वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव
जन्म तारीख31 जुलाई 1880
जन्म स्थान लमही गांव, वाराणसी, उत्तर-प्रदेश
मृत्यु8 अक्टूबर 1936
पिता का नाम मुंशी अजायब राय
माता का नाम आनन्दी देवी
पत्नी का नामशिवरानी देवी
पुत्र/पुत्री के नामश्रीपत राय , अमृत राय, कमला देवी
ज्ञात भाषाएंहिंदी, उर्दू
कर्मभूमि गोरखपुर
शिक्षास्नातक
व्यवसायअध्यापन, लेखन , पत्रकारिता
प्रसिद्ध रचनाएं गबन, गोदान, कफ़न ,रंगभूमि, कर्मभूमि, निर्मला

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प्रेमचन्द का जीवन परिचय – Premchand Biography in Hindi

मुंशी प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई, 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से लगभग छः किलोमीटर दूर लमही गांव में एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनका असली नाम धनपतराय था। उनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल था, और माता का नाम आनन्दी देवी था ।

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पिता डाकघर में मुंशी के पद पर सरकारी नौकरी करते थे। मुंशी प्रेमचंद बचपन में बहुत नटखट और शैतान बालक थे । उन्हें मिठाई के रूप में गुड़ खाने का बहुत शौक था । उस जमाने में उर्दू भाषा का सरकारी काम-काज की भाषा में विशेष प्रभाव था। प्रेमचन्द के घराने में सभी उर्दू के जानकार थे, अतः पिता ने उन्हें भी प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू में दिलाने की शुरूआत की। गांव के करीब लालगंज नामक गांव में एक मौलवी के पास उन्हें उर्दू-फारसी शिक्षा के लिए भेजा ।

प्रेमचंद की शिक्षा-दीक्षा – Education of Premchand

आरम्भिक शिक्षा मौलवियों से प्राप्त करने वाले प्रेमचन्द ने मैट्रिक की परीक्षा 1898 में पास कर ली थी । और उसके बाद स्थानीय विद्यालय में अध्यापन कार्य करने लगे । नौकरी के साथ-साथ इन्होंने अपनी पढ़ाई को जारी रखा ।

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इन्होंने 1910 में इतिहास, दर्शन, फारसी और अंग्रेजी में इण्टर की परीक्षा पास की और 1919 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य, फारसी व इतिहास विषयों में द्वितीय श्रेणी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की, फिर शिक्षा विभाग में डिप्टी इंस्पेक्टर बने ।

व्यक्तिगत जीवन – Personal Life प्रेमचन्द का जीवन परिचय | Biography Of Premchand In Hindi| PremChand Ka Jivan Parichay

प्रेमचंद कायस्थ परिवार से थे, उनका परिवार बड़ा था और मात्र 6 बीघा जमीन थी । प्रेमचंद के दादाजी गुरु सहाय लाल एक पटवारी थे। पिता डाक मुंशी थे जिनका वेतन लगभग ₹25 प्रतिमाह था । उनकी माता आनंदी देवी कुशल गृहिणी थीं ।

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घरेलू वातावरण ऐसा था कि पिता नौकरी पर तो मां घरेलू काम-काज में ! बच्चा पढ़ रहा है या नहीं, इस बात को देखने वाला कोई न था। यही वजह थी कि प्रेमचन्द का स्वभाव खिलन्दड़ बन गया। थोड़ी सी पढ़ाई, ढेरों खेल बचपन के खिलन्दड़ दिनों को प्रेमचन्द कभी न भूले। उनके उपन्यास और कहानियों में जगह-जगह उन दिनों के खेलों का जिक्र मिल जाता है। मां के साथ दादी का लाड़ प्यार भी खूब मिलता था।

इस तरह बचपन के दिन प्रेमचन्द के खूब मौज-मस्ती में गुजरे । पर, अभी उनकी उम्र सात साल की ही थी कि मां ऐसी गम्भीर रूप से बीमार पड़ीं कि उठ न सकीं। बालक धनपत को बेसहारा छोड़कर मां इस दुनिया से सिधार गयीं। मां के निधन से जीवन में आयी रिक्तता का वर्णन मुंशी प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों में जगह-जगह लिखा है।

उनके पिता ने 2 वर्ष बाद ही दूसरा विवाह कर लिया। प्रेमचंद को छोटी उम्र में ही सौतेली माँ का साथ मिला, निश्चित ही सौतेली मां से शायद उन्हें वह ममता प्राप्त नहीं हुई, जो एक माँ से प्राप्त होती है, शायद इसी कारण उनकी रचनाओं में कई जगहों पर सौतेली मां का वर्णन है।

प्रेमचंद का विवाह – Marriage of Premchand

15 वर्ष की छोटी उम्र में ही प्रेमचंद का विवाह हो गया । उनकी यह शादी उनके सौतेले नाना के द्वारा कराई गई थी। उस समय की रचनाओं के विवरण से ऐसा लगता है कि उनकी पत्नी ना तो देखने में ही सुंदर थी और शायद झगड़ालू प्रवृत्ति की थी। इन सब कारणों से उनका यह विवाह लंबा नहीं चल सका, और उन्होंने अपनी पत्नी से संबंध विच्छेद कर लिया।

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शादी के एक वर्ष बाद ही उनके पिता का निधन हो गया, और परिवार का पूरा बोझ इन पर ही आ गया । उन्हें पाँच लोगों के परिवार का खर्च उठाना पड़ता था। उनके आर्थिक संकट का पता इस बात से चलता है कि उन्होंने पैसों के अभाव के कारण अपना कोट और किताबें बेच दीं थीं ।

प्रेमचंद का दूसरा विवाह – Second Marriage of Premchand

सन् 1906 में प्रेमचंद ने शिवरानी देवी नाम की एक बाल-विधवा से दूसरा विवाह कर लिया । शिवरानी देवी से उनको तीन संतान थी – श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी । शिवरानी देवी के पिता फतेहपुर के पास रहने वाले एक जमीदार थे । समय के उस दौर में एक विधवा से विवाह करने वाले प्रेमचंद के साहसी व्यक्तित्व का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है ।

दूसरे विवाह के पश्चात प्रेमचंद की परिस्थितियों में बदलाव आया, आर्थिक संकट कम हो गए, वह अपने लेखन कार्य को अधिक सजगता से करने लगे , और उनकी पदोन्नति हुई और वे स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर बन गए । ये प्रेमचंद जी के खुशहाली के दिन थे , इन्ही दिनों इनकी पाँच कहानियों का संग्रह “सोज़े वतन” प्रकाशित हुआ , और बहुत लोकप्रिय हुआ।

प्रेमचंद की साहित्यिक रूचि – Literary Interest of Premchand

प्रेमचंद को बचपन से ही पढ़ने का बड़ा शौक था। उन्होंने उस जमाने के मशहूर लेखकों रतननाथ सरसार, मिर्जा रुसवा और मौलाना शरर की कृतियों को बड़े चाव से पढ़ा और उसका मनन किया। “तिलिस्म होशरुबा” उस जमाने की बहुत मशहूर तिलिस्मी और अय्यारी कथानक पर आधारित पुस्तक थी, कई खण्डों में थी, उन्होंने वह बारह-तेरह साल की उम्र में पूरी पढ़ डाली थी।

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अंग्रेजी भाषा में लिखी लेखक रेनाल्ड की “मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लन्दन” भी उन्होंने पढ़ी। मौलाना सज्जाद हुसैन की हास्य कृतियों का भी अध्ययन किया।अय्यारी, तिलिस्म, रहस्य-रोमांच, हास्य कृतियों का शौक से अध्ययन करने वाले प्रेमचन्द उन विषयों के एकदम विपरीत सामाजिक जीवन पर आधारित उपन्यास और कहानियां कैसे लिखने लगे, यह जरा ताज्जुब की बात लगती पर शायद कुदरत ने उन्हें कलम के सिपाही के रूप में ही उतारा था। सिपाही बनकर सामाजिक जीवन की व्यथा की कलम के माध्यम से रक्षा की और जीवन भर उसी काम में लगे रहे।

प्रेमचन्द का साहित्यिक परिचय- Literary Introduction of Premchand

प्रेमचन्द ने अपनी लेखनी की शुरूआत भी उर्दू भाषा में की। धनपत राय के बजाय उन्होंने नवाबराय के नाम से लिखना आरम्भ किया। उनकी पहली कहानी मात्र 17 वर्ष की उम्र में, 1907 में ज़माना पत्रिका में प्रकाशित हुई। कहानी का शीर्षक था ‘संसार का सबसे अनमोल रत्न’

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लेखन की शुरूआत की तो लिखते चले गये और कहानियां छपती चली गयीं। 1910 में उनका पहला कहानी संग्रह “सोज़े-वतन” ( राष्ट्र का विलाप ) शीर्षक से छपकर बाजार में आया ( क्योंकि यह राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत था ) तो अंग्रेज सरकार के कान खड़े हुए। सोजे वतन के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने प्रेमचंद को तलब किया , तथा उन पर अपनी पुस्तक सोजे वतन के माध्यम से जनता को भड़काने का आरोप लगाया गया ।

सोज़े-वतन को जब्त कर उसकी प्रतियां जला दी गयीं। कलम के सिपाही पर कलम चलाने की पाबन्दी लग गयी। प्रेमचंद उस समय नवाब राय के नाम से लिखा करते थे । नवाब राय पर सरकारी तौर पर अनेक प्रतिबन्ध लग गये। इन प्रतिबन्धों के कारण वे नवाब राय के नाम से न लिख सकते थे।

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तब, उस समय के प्रसिद्ध पत्रकार प्रेमचंद के अभिन्न मित्र ज़माना पत्रिका के सम्पादक मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें नया नाम दिया – प्रेमचन्द। और इसके बाद वे प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे। पत्रिका के लेखन कार्य की शुरुआत उन्होंने जमाना पत्रिका से ही शुरू की।

प्रेमचंद पर महात्मा गांधी जी का प्रभाव – Influence of Mahatma Gandhi on Premchand

सन् 1920 में, महात्मा गांधी के आन्दोलन से प्रभावित होकर उनके आह्वान पर प्रेमचन्द ने सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया ।

प्रेमचंद का कार्य क्षेत्र – Premchand’s Work Area

नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद कुछ समय तक मर्यादा पत्रिका का संपादन किया, फिर लगभग 6 वर्ष तक माधुरी नाम की एक अन्य पत्रिका का संपादन भी किया । फिर 1930 में बनारस में ही रहते हुए प्रेमचंद जी ने अपना ही स्वयं का एक मासिक पत्र हंस के नाम से प्रकाशित किया तत्पश्चात 1932 में जागरण नाम का एक और साप्ताहिक पत्र शुरू किया ।

1934 में रिलीज हुई मजदूर नामक फिल्म की कथा का लेखन इन्होंने ही किया परन्तु मुंबई ( बम्बई ) की सभ्यता और फिल्मी दुनिया की आवों -हवा उन्हें रास ना आई और अपने 1 वर्ष का कॉन्ट्रैक्ट का समय पूरा किए बगैर ही अपने 2 महीने की पगार छोड़कर बनारस वापस आ गए । 1936 में उन्होंने अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता भी की।

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प्रेमचंद जी ने 1915 से कहानियां लिखना प्रारंभ किया तथा 1918 से उपन्यासों को लिखना भी प्रारंभ किया। पंच परमेश्वर, प्रेमचन्द की हिन्दी में प्रकाशित पहली कहानी थी। उन्होंने 300 के लगभग कहानियां और15 उपन्यास लिखे। 3 नाटक, 10 अनुवाद 7 बाल-पुस्तकें, भाषण, पत्र, लेख और सम्पादन कार्य भी किया।

पर उनकी ख्याति का मूल आधार उपन्यास व कथा साहित्य बना। प्रेमचंद जी की कई रचनाओं का अनुवाद रूसी, जर्मनी, अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में हुआ । गोदान उपन्यास को उनकी कालजयी रचना माना जाता है ।

प्रेमचंद की रचनाएं- Compositions of Premchand

मुंशी प्रेमचंद की लेखन प्रतिभा साहित्य की विभिन्न विधाओँ में दिखाई देती है क्योंकि उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, लेख, समीक्षा, संस्मरण, संपादकीय आदि लगभग प्रत्येक क्षेत्र में साहित्य सृजन किया। इसी कारण “उपन्यास सम्राट” उपाधि उन्हे अपने जीवन काल में ही मिल गई थी।

सेवा सदन, गबन, कायाकल्प, प्रेमाश्रय, रंगभूमि और गोदान उपन्यास उनकी श्रेष्ठ कृतियों में गिने जाते हैं। उनकी कहानियां मानसरोवर के आठ खण्डों में संकलित हैं। उनके निबन्ध ‘कुछ विचार’ नामक पुस्तक में संकलित हैं। सामाजिक और राजनीतिक निबन्ध ‘विविध प्रसंग’ में संग्रहीत हैं। कफन उनके द्वारा लिखी गई अंतिम कहानी थी ।

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Premchand ki Rachnaen, Premchand Biography in Hindi

रचनाओं का विषय- Subject of Compositions

उनकी रचनाओं का मूल विषय राष्ट्रीय जागरण और समाज सुधार है, जिसकी वजह से उनकी रचनाएं आदर्शवाद से प्रेरित कही  जाती है। किसान, शोषित व  मजदूरों  के प्रति उनकी बहुत सहानुभूति होती थी। उनकी रचनाओं में आदर्श और यथार्थ का सहज चित्रण मिलता है।

भाषा – Language

मुंशी प्रेमचंद की भाषा सहज, सरल तथा पात्रों के अनुकूल है । इसी कारण उन्हें उपन्यास सम्राट कहा गया।

मुंशी” उपनाम के विषय में बहस – Debate About the Surname “Munshi”

प्रेमचन्द का जीवन परिचय में हम आपको बता रहे है कि प्रेमचंद जी को हमेशा “मुंशी प्रेमचंद” के नाम से पुकारा जाता है परंतु उनके नाम प्रेमचंद के पहले ” मुंशी” शब्द कब और कैसे जुड़ा इस विषय में लोगों के बीच एक अलग प्रकार की बहस हमेशा रही है। कुछ लोगों का कहना है प्रेमचंद जी एक अध्यापक थे तथा अध्यापकों को उस काल में मुंशी कहा जाता था, इसी कारण उन्हें मुंशी प्रेमचंद कहा जाने लगा।

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इस मान्यता के अलावा कुछ अन्य लोगों का तर्क है कि प्रेमचंद जी कायस्थ थे, और उन दिनों कायस्थ लोगों के नाम के पहले सम्मान के तौर पर “मुंशी” शब्द का प्रयोग करने की परंपरा थी । इन सभी तर्कों में सबसे प्रमाणिक तथ्य यह है कि – प्रेमचंद एवं ‘कन्हैयालाल मुंशी‘ के सह संपादन में “हंस” नाम का एक पत्र प्रकाशित होता था, उसी पत्र की कुछ प्रतियों पर कन्हैयालाल मुंशी का पूरा नाम छापने के स्थान पर केवल “मुंशी” ही छपा होता था और इसके साथ ही प्रेमचंद का नाम भी छपा होता था , अतः वह पढ़ने वाले को इस प्रकार दिखाई देता था – मुंशी, प्रेमचंद

हंस पत्र के संपादक दो अलग-अलग लोग प्रेमचंद तथा कन्हैयालाल मुंशी थे । परंतु लंबे समय तक इन दो नामों को पढ़ते-पढ़ते लोगों ने इसे एक ही नाम की तरह पढ़ना, बोलना शुरू कर दिया। और इस प्रकार ‘ प्रेमचंद’ “मुंशी प्रेमचंद” बन गए। मुंशी शब्द उनके नाम का एक ऐसा अभिन्न उपसर्ग बन गया कि मुंशी शब्द के बिना उनका नाम अधूरा प्रतीत होता है।

निधन- Death

अपने जीवन के अंतिम दिनों में प्रेमचंद जी गंभीर रूप से बीमार हो गए , उनकी लंबी बीमारी के कारण उनका अंतिम उपन्यास “मंगलसूत्र” भी पूरा नहीं हो सका, जिसे उनके साहित्यकार पुत्र अमृत ने पूर्ण किया । अंततः महान रचनाकार “कलम के जादूगर” का निधन 8 अक्टूबर, 1936 को जलोदर नामक भयंकर बीमारी के कारण वाराणसी में हुआ।

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लगभग 33 वर्षों के अपने लेखकीय जीवन में वे हिंदी साहित्य को ऐसी विरासत देकर गए हैं जो चिरकाल तक हमारी धरोहर रहेगी। इस प्रकार अपने साहित्य-प्रेम की लौ से अपने जीवन को तिल-तिल जलाकर हिन्दी साहित्य के पथ को आलोकित कर यह दीप हमेशा के लिए बुझ गया ।

प्रेमचंद पर डाक टिकट व सम्मान – Postage Stamp and Honour on Premchand

भारतीय डाक एवं तार विभाग की और से मुंशी प्रेमचंद जी की स्मृति में व उन्हें सम्मान प्रदान करने के लिए 31 जुलाई 1980 को उनकी जन्मशती के महत्वपूर्ण मौके पर 30 पैसे का एक डाक टिकट जारी किया गया ।

प्रेमचंद गोरखपुर के जिस विद्यालय में शिक्षक के तौर पर कार्यरत थे वहां “प्रेमचंद साहित्य संस्थान” की स्थापना की गई है । इसी विद्यालय में उनकी एक वक्ष प्रतिमा तथा उन से जुड़ी हुई वस्तुओं का एक संग्रहालय भी बनवाया गया है।

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सरकार की ओर से प्रेमचंद जी की 125 वीं सालगिरह पर घोषणा की गई कि उनके गांव में प्रेमचंद जी के नाम पर एक स्मारक तथा शोध एवं अध्ययन केंद्र की स्थापना की जाएगी।

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FAQ

प्रश्न – प्रेमचंद का जन्म कब हुआ ?

उत्तर – प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 में हुआ ।

प्रश्न – प्रेमचंद किस नाम से मशहूर हैं ?

उत्तर – प्रेमचंद, मुंशी प्रेमचंद के नाम से मशहूर हैं ।

प्रश्न – प्रेमचंद के कितने बच्चे थे ?

उत्तर – प्रेमचंद के दो बेटे तथा एक बेटी थी ।

प्रश्न – प्रेमचंद के दादाजी का क्या नाम था ?

उत्तर – प्रेमचंद के दादाजी का नाम श्री गुरु सहाय राय था ।

प्रश्न – प्रेमचंद के माता-पिता का क्या नाम है ?

उत्तर –प्रेमचंद के पिता का नाम मुंशी अजायब लाल था, और माता का नाम आनन्दी देवी था ।

प्रश्न – प्रेमचंद की पहली कहानी कौन सी है ?

उत्तर – प्रेमचंद के नाम से प्रकाशित उनकी पहली कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ है ।

प्रश्न – प्रेमचंद की अंतिम कहानी कौन सी है ?

उत्तर – प्रेमचंद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण व अंतिम उपन्यास ‘गोदान’ को माना जाता है।

प्रश्न – प्रेमचंद की मृत्यु कब और कैसे हुई ?

उत्तर – प्रेमचंद की मृत्यु 8 अक्टूबर, 1936 को जलोदर नामक भयंकर बीमारी के कारण वाराणसी में हुई ।

तो दोस्तों , प्रेमचन्द का जीवन परिचय | Biography of Premchand in Hindi | premchand ka jivan parichay लेख आपको कैसा लगा ? हमें पूर्ण विश्वास है कि आपको महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद के जीवन परिचय से संबंधित वृहत एवं विस्तृत जानकारी अवश्य पसंद आई होगी।

दोस्तों जैसा कि हमने पहले भी कहा है कि आपकी समालोचना से हमें बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है । अतः हमारे लेख पढ़ने के बाद कमेंट बॉक्स में अपनी राय लिखकर हमें अवश्य भेजें, अगर इस लेख से संबंधित आपके कोई प्रश्न हो तो आप कॉमेंट करके पूछ सकते हैं, लेख को पूरा पढ़ने के लिए धन्यवाद !

अंत में – हमारे आर्टिकल पढ़ते रहिए, हमारा उत्साह बढ़ाते रहिए, खुश रहिए और मस्त रहिए।

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