Prithviraj Chauhan Biography in Hindi, History | पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय, इतिहास  

भारत के परम प्रतापी और शूरवीर हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) ( 1178-1192 ) चौहान वंश के हिंदू राजा थे, पृथ्वीराज चौहान 12 वीं सदी के उत्तरार्ध में दिल्ली और अजमेर पर शासन करते थे। 1166 में अजमेर के राजा सोमेश्वर चौहान के परिवार में पाटन, गुजरात में जन्मे पृथ्वीराज बचपन से ही बहुत प्रतिभाशाली थे । बचपन में ही पिता की मृत्यु के बाद मात्र 11 वर्ष की उम्र में वे अजमेर की राजगद्दी पर बैठे।

पृथ्वीराज ने बचपन से ही एक कुशल योद्धा के सभी गुण सीख लिए थे। पृथ्वीराज चौहान महान योद्धा होने के साथ-साथ बचपन से ही बहुत बहादुर और साहसी थे , 13 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने गुजरात के पराक्रमी राजा भीमदेव को हराया था  ।

आज हम आपको भारत के ऐसे शूरवीर महा पराक्रमी राजा की सम्पूर्ण जीवन गाथा अपने लेख Prithviraj Chauhan Biography in Hindi, History  । पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय, इतिहास  के माध्यम से बता रहे हैं, तो दोस्तों आइए जानते हैं इनके बारे में

Table of Contents

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास, The History of Prithviraj Chauhan, Prithviraj Chauhan Biography in Hindi

बिन्दु जानकारी
पूरा नाम पृथ्वीराज चौहान
अन्य नाम राय पिथौरा, अन्तिम हिन्दू सम्राट, भारतेश्वर , पृथ्वीराज तृतीय,
सपदलक्षेश्वर
जन्म 1166
जन्म स्थान पाटण, गुजरात, भारत
पिता का नाम राजा सोमेश्वर चौहान
माता का नाम कर्पूरा देवी
भाई का नाम हरिराज (छोटा भाई )
बहन का नाम पृथा ( छोटी बहन )
पत्नी (13) जंभावती पडिहारी, पंवारी इच्छनी, दाहिया, जालंधरी, गूजरी,
बडगूजरी, यादवी पद्मावती, यादवी शशिव्रता, कछवाही,
पुडीरनी, शशिव्रता, इंद्रावती, संयोगिता गहड़वाल
पुत्र का नाम गोविन्दराज चौहान
शासनकाल1178- 1192
राजवंश शाकंभरी के चाहमान (चौहान वंश)
धर्महिंदू
मृत्यु 11 मार्च 1192
Prithviraj Chauhan Biography in Hindi
Prithviraj Chauhan Biography in Hindi

पृथ्वीराज चौहान का जन्म, परिवार एवं प्रारम्भिक जीवन : Prithviraj Chauhan Birth, Family and Early Life

हिन्दू सम्राट शिरोमणि, भारतीय इतिहास के सर्वकालिक महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान का जन्म चौहान वंश के राजपूत राजा सोमेश्वर चौहान और कर्पूरा देवी के घर पाटन, गुजरात में 1166 में हुआ था  । इनके छोटे भाई का नाम हरिराज था।

ऐसा माना जाता है कि पृथ्वीराज का जन्म माता-पिता के विवाह के कई सालों के बाद बहुत पूजा पाठ और और मन्नतें माँगनें के बाद हुआ था। पृथ्वीराज का जन्म एक राजघराने में होने के कारण उनका पालन पोषण बहुत सुख-सुविधाओं तथा ऐश्वर्यपूर्ण वातावरण में हुआ था  ।

पृथ्वीराज चौहान की शिक्षा-दीक्षा : Prithviraj Chauhan Education

पृथ्वीराज अपने बचपन से ही बेहद पराक्रमी, वीर, साहसी, बहादुर तथा युद्ध कौशल में निपुण थे।उनकी शिक्षा सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ में हुई। पृथ्वीराज चौहान ने अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कौशल की शिक्षा अपने गुरु श्री राम जी से प्राप्त की। चंदबरदाई द्वारा लिखित पृथ्वीराज रासो ग्रंथ के अनुसार पृथ्वीराज चौहान अश्व तथा हाथी नियंत्रण विद्या में भी निपुण थे।

पृथ्वीराज चौहान 6 भाषाओं – प्राकृत, संस्कृत, पैशाची, अपभ्रंश, मगधी, और शौरसैनी के ज्ञाता थे।इसके अलावा उन्हें गणित, इतिहास, पुराण, वेदान्त, मीमांसा, सैन्य विज्ञान व चिकित्सा विज्ञान का भी अच्छा ज्ञान था।

पृथ्वीराज चौहान का शब्द भेदी बाण विद्या कौशल : Word Piercing Arrow Learning Skills of Prithviraj Chauhan

पृथ्वीराज चौहान ने बचपन से ही शब्दभेदी बाण चलाने की महान कला सीख ली थी, वे इस कला में पारंगत थे। उनका शब्दभेदी बाण विद्या का कौशल ऐसा था कि वे लक्ष्य को देखे बिना ही केवल आवाज पर बाण चलाकर लक्ष्य भेदन कर सकते थे  । इतिहासकारों के अनुसार पृथ्वीराज बचपन से ही इतने बलवान थे कि एक बार उन्होंने एक शेर को बिना किसी हथियार की मदद के मार डाला था ।

पृथ्वीराज चौहान का अजमेर व दिल्ली की राजगद्दी पर राज्याभिषेक : Coronation of Prithviraj Chauhan On The Throne of Ajmer and Delhi

1177 में जब पृथ्वीराज चौहान मात्र 11 वर्ष के थे तभी उनके पिता महाराज सोमेश्वर चौहान यवनों से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए, तब पृथ्वीराज चौहान अजमेर के उत्तराधिकारी होने के नाते गद्दी पर पदासीन हुए , इनके उत्तराधिकार को इनके पिता के सौतेले भाई बीसलदेव के पुत्र नागराज ने चुनौती दे डाली।

तब इनकी माता कर्पूरी देवी ने पृथ्वीराज की सेना की कमान संभालते हुए सेनापति चामुंडराय की मदद से नागराज को गुड़गांव के पास बंदी बना लिया और उसका वध कर दिया कर दिया। तब पृथ्वीराज चौहान अजमेर के शासक बने  । 13 साल कि उम्र में उन्होंने गुजरात के पराक्रमी राजा भीमदेव को हरा दिया था।

पृथ्वीराज चौहान के नाना अनंगपाल दिल्ली के सम्राट थे, अनंगपाल की मृत्यु के बाद पृथ्वीराज चौहान का दिल्ली के राज सिंहासन पर राज्याभिषेक हुआ। दिल्ली के राजा अनंगपाल के कोई पुत्र नहीं था।

इसलिए उन्होंने अपने दामाद अजमेर के शासक महाराज सोमेश्वर सिंह चौहान से उनके पुत्र पृथ्वीराज चौहान की प्रतिभा को देखते हुए दिल्ली का युवराज घोषित करने के लिए आज्ञा मांगी थी , पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर सिंह ने अपने पुत्र को दिल्ली का युवराज घोषित करने की आज्ञा प्रदान कर दी।

और इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का युवराज घोषित कर दिया गया, और उनके नाना अनंगपाल की मृत्यु उपरांत कुछ राजनीतिक संघर्ष के बाद पृथ्वीराज चौहान का दिल्ली पर भी शासन हो गया , और बड़ी कुशलतापूर्वक उन्होंने दिल्ली की बागडोर को संभाला ।

पृथ्वीराज चौहान ने एक आदर्श राजा की तरह अपने साम्राज्य का विस्तार और उसे मजबूती देने के लिए बहुत से अभियान चलाएं और कई युद्ध लड़े, अपने इन कृत्यों से बहुत जल्द ही पृथ्वीराज चौहान की एक महान व शूरवीर योद्धा, तथा लोकप्रिय राजा के तौर पर पहचान बनने लगी तथा उनके पराक्रम और वीरता की कीर्ति चारों दिशाओं में फैलने लगी।

चंदवरदाई और पृथ्वीराज की मित्रता : Friendship of Prithviraj Chauhan and Chandbardai

चंदवरदाई और पृथ्वीराज बचपन के अभिन्न मित्र थे, विद्वानों के अनुसार दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ था, और मृत्यु भी एक ही दिन एक ही समय पर हुई  । बचपन से ही दोनों की मित्रता बहुत प्रगाढ़ थी, चंदबरदाई एक बड़े भाई की तरह हमेशा उनका ख्याल रखते थे।

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बड़े होकर चंदवरदाई एक प्रसिद्ध लेखक और कवि बन गए , उन्हे राजदरबार में राजकवि का दर्जा प्राप्त था। और उन्होंने पिंगल भाषा में ( राजस्थानी में ब्रजभाषा का पर्याय ) ‘पृथ्वीराज रासो’ नामक महान महाकाव्य लिखा, इस ग्रंथ को हिन्दी भाषा का पहला एवं सबसे बड़ा काव्य ग्रंथ माना जाता है।

पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई के बीच मित्रता की घनिष्ठता का अंदाजा इस बात से सहज ही लगाया जा सकता है कि मुहम्मद ग़ोरी से युद्ध में पराजय के बाद जब मोहम्मद ग़ोरी  पृथ्वीराज व चंदबरदाई दोनों को गजनी ले गया। गजनी में पृथ्वीराज चौहान को मुहम्मद ग़ोरी ने बहुत यातनाएं दी, लोहे की गर्म सलाखों से उनको नेत्र विहीन कर दिया गया।

अपने परम मित्र और भारत के महान योद्धा के साथ यह दुर्व्यवहार चंदबरदाई को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा, तब चंदबरदाई ने अपनी एक योजना के अनुसार मुहम्मद ग़ोरी को पृथ्वीराज के हाथों मरवा दिया, और इसी के साथ भारतीय इतिहास में पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई की मित्रता अमर हो गई।

पृथ्वीराज चौहान व राजकुमारी संयोगिता की अमर प्रेम कथा : The Immortal Love Story of Prithviraj Chauhan and Princess Sanyogita

पृथ्वीराज चौहान और राजकुमारी संयोगिता (Princess Sanyogita) की प्रेम कहानी राजस्थान के राजपूताना इतिहास में बहुत ही प्रसिद्ध है  । कहा जाता है कि वे दोनों ही बिना एक दूसरे से मिले केवल एक दूसरे की तस्वीरों को देखकर आपस में अटूट प्रेम करने लगे थे।

उस काल में कन्नौज के महाराजा जयचंद की पुत्री राजकुमारी संयोगिता बला की खूबसूरत थी। राजा जयचंद पहले से ही पृथ्वीराज के बढ़ते हुए यश और शौर्य के कारण उनसे ईर्ष्या रखता था।

हुआ यूँ कि एक दिन पन्नाराय नामक एक चित्रकार कन्नौज आया, उसके पास दुनिया भर के महान यशस्वी राजकुमारों व राजाओं के चित्र थे और उन्हीं में एक चित्र दिल्ली के युवा सम्राट पृथ्वीराज चौहान का भी था, पृथ्वीराज के चित्र में उनकी खूबसूरती को देखकर कन्नौज की युवतियाँ मंत्रमुग्ध हो गई।

धीरे-धीरे इस बात की चर्चा राजकुमारी संयोगिता तक पहुंची तो वह भी पृथ्वीराज की उस तस्वीर को देखने के लिए अधीर हो उठी । राजकुमारी संयोगिता ने अपनी सखियों के साथ उस चित्रकार के पास पहुंचकर पृथ्वीराज की तस्वीर को देखा और पहली ही नजर में उन्हें दिल दे बैठी।

इसी बीच चित्रकार ने दिल्ली पहुंचकर महाराज पृथ्वीराज से मुलाकात की और राजकुमारी संयोगिता का एक चित्र बनाकर उन्हें दिखाया, चित्र में राजकुमारी संयोगिता के सौंदर्य को देखकर पृथ्वीराज भी उन पर मोहित हो गए और उन्हें प्यार करने लगे।

राजकुमारी संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान के प्रेम प्रसंग के बारे में जब संयोगिता के पिता राजा जयचंद को पता चला तो उन्होंने अपनी पुत्री संयोगिता के विवाह के लिए एक स्वयंवर रचा ।

राजकुमारी संयोगिता का स्वयंवर : Princess Sanyogita’s Swayamvara

कन्नौज के राजा जयचंद ने उन्हीं दिनों अपनी पुत्री राजकुमारी संयोगिता के लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया। स्वयंबर से पहले संपूर्ण भारत पर अपना शासन कायम करने के उद्देश्य से राजा जयचंद ने एक अश्वमेध यज्ञ आयोजन किया था, इस यज्ञ के संपूर्ण होने के पश्चात ही राजकुमारी संयोगिता का स्वयंबर संपन्न होना था  ।

पृथ्वीराज चौहान नहीं चाहते थे कि घमंडी और अन्यायी राजा जयचंद का शासन समस्त भारत पर हो, इसलिए उन्होंने जयचंद का विरोध किया, और इसी के चलते पृथ्वीराज के प्रति जयचंद के मन में घृणा और बढ़ गई।

जयचंद ने सभी राज्यों के राजकुमारों व राजाओं को आमंत्रित किया परंतु इस स्वयंवर में ईर्ष्या के कारण पृथ्वीराज चौहान को आमंत्रित नहीं किया। इसके अलावा जयचंद ने पृथ्वीराज चौहान का अपमान करने के उद्देश्य से उनकी एक प्रतिमा को स्वयंवर में द्वारपाल के स्थान पर खड़ा कर दिया।

राजकुमारी संयोगिता हाथ में वरमाला लेकर जब स्वयंवर में पहुंची तो चारों ओर देखने के बाद भी पृथ्वीराज चौहान सभा में उन्हें कहीं दिखाई नहीं दिये , परंतु द्वारपाल के स्थान पर पृथ्वीराज की मूर्ति पर उनकी नजर पड़ी तो उन्होंने उसी मूर्ती के गले में वरमाला डाल दी।

दरअसल जिस समय राजकुमारी संयोगिता मूर्ति के गले में वरमाला डाल रही थी ठीक उसी समय स्वयं पृथ्वीराज चौहान वहां पहुंचकर उनके सामने खड़े हो गए और वह वरमाला उनके गले में पड़ गई।

यह सब देख कर जयचंद गुस्से में तलवार लेकर राजकुमारी संयोगिता को मारने के लिए उसकी और बढा लेकिन उससे पहले ही पृथ्वीराज चौहान सभा में उपस्थित सभी राजाओं को ललकारते हुए संयोगिता को लेकर वहां से दिल्ली की ओर निकल गए ।

जयचंद के सैनिक पृथ्वीराज चौहान का बाल भी बांका नहीं कर सके, पृथ्वीराज चौहान की ये प्रेम कहानी अपने आप में एक एतिहासिक मिशाल बन गयी  । इस घटना के बाद 1189 तथा 1190 में पृथ्वीराज चौहान और राजा जयचंद की सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें दोनों ओर से जानमाल का भारी नुकसान हुआ  ।

पृथ्वीराज चौहान की सेना : Prithviraj Chauhan’s Army

महान हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पास एक विशाल सेना थी , जिसमें 300 हाथी, 3 लाख सैनिक तथा 70 हजार घुड़सवार शामिल थे  । पृथ्वीराज चौहान के पास एक बहुत ही मजबूत एवं संगठित सेना थी, उन्होंने अपनी इस विशाल सेना के बल पर बहुत से युद्ध जीते और अपना साम्राज्य विस्तार किया। अपने साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ वे अपनी सेना का और विस्तार करते गए  ।

भारत के इस महान हिंदू सम्राट के पास नारायण युद्ध में मात्र 2 लाख घुड़सवार सैनिक, 500 हाथी और बहुत से सैनिक थे  ।

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अफ़ग़ान शासक मुहम्मद ग़ोरी : Afghan Ruler Muhammad Ghori

गयासुद्दीन गौरीशहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी दो भाई जो अफगान के शासक थे, वे स्वभाव से युद्ध प्रेमी थे। वे हमेशा दूसरे देशों पर आक्रमण करते, उनकी संपदा लूटते, सुंदर स्त्रियों के साथ व्यभिचार करते और मुस्लिम धर्म का प्रचार प्रसार करते थे  ।

भारत की अकूत संपदा का पता चला तो बड़े भाई गयासुद्दीन गोरी ने शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी को भारत पर आक्रमण करने, संपदा लूटने, स्त्रियों को बंदी बनाने व मंदिरों को खंडित करने का आदेश दिया  ।

मुहम्मद ग़ोरी भारत पर आक्रमण करने के लिए निकल पड़ा, उसने उत्तरी भारत के अनेक छोटे-छोटे राज्यों को जीता और फिर उसने पृथ्वीराज चौहान के राज्य पर चढ़ाई कर दी  ।

पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद ग़ोरी के बीच तराइन का प्रथम युद्ध ( 1191 ) : First War of Tarain Between Prithviraj Chauhan and Muhammad Ghori

महान शासक पृथ्वीराज चौहान ने अपनी बुद्धिमता , दूरदर्शिता और कुशल नीतियों के बल पर चारों दिशाओं में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। पृथ्वीराज चौहान अपने विजय अभियान को बढ़ाते हुए पंजाब पर भी शासन करना चाहते थे, उन दिनों मोहम्मद शहाबुद्दीन ग़ोरी पंजाब के कुछ हिस्सों को जीतने के बाद दिल्ली की ओर बढ़ रहा था।

मुहम्मद ग़ोरी के खिलाफ युद्ध की तैयारी के लिए पृथ्वीराज चौहान ने कुछ राजपूत राजाओं को अपने साथ मिला लिया ताकि वे मुहम्मद ग़ोरी पर एकजुट होकर आक्रमण कर सकें  । उज्जैन का शासक जयचंद व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण इस युद्ध में शामिल नहीं हुआ और उसने पृथ्वीराज चौहान का साथ नहीं दिया, तराइन नामक स्थान पर दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ।

इस युद्ध के परिणाम स्वरूप सरहिंद, हांसी और सरस्वती पर पृथ्वीराज चौहान का प्रभुत्व स्थापित हो गया। परंतु उसी समय मुहम्मद ग़ोरी ने अपनी सेना के साथ अनहिलवाड़ा में हमला कर दिया और इस वक़्त पृथ्वीराज का सैन्य बल कमजोर पड़ गया और इसी कारण सरहिन्द का किला पृथ्वीराज चौहान के हाथ से निकल गया  ।

इसके बाद पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद ग़ोरी का अकेले ही बड़ी वीरता से मुकाबला किया , परिणामस्वरूप गोरी बहुत बुरी तरह से जख्मी हो गया, परंतु उसके सैनिकों ने उसे घोड़े पर बैठा कर युद्ध के मैदान से दूर कर दिया।

और किसी प्रकार घायल होने के बाद भी गोरी बच निकला  । इस युद्ध का कोई भी परिणाम नहीं निकल सका, भारतीय क्षत्रिय परंपराओं के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने भागते हुए शत्रु का पीछा नहीं किया  ।

यह युद्ध सरहिन्द के किले के पास तराइन ( तरावड़ी ) नामक स्थान पर हुआ इसलिए इसे तराइन के प्रथम युद्ध के नाम से जाना जाता है  । इतिहासकारों के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने इस युद्ध में लगभग 7 करोड से भी अधिक की संपत्ति हासिल की थी, जिसका कुछ हिस्सा अपने पास रख कर शेष संपत्ति उसने अपने सैनिकों में बांट दी थी।

पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद ग़ोरी के बीच द्वितीय युद्ध ( 1192 ) : Second War of Tarain Between Prithviraj Chauhan and Muhammad Ghori

मुहम्मद ग़ोरी हर कीमत पर भारत पर अपना शासन स्थापित करना चाहता था  । इसी कारण उसने 18 बार आक्रमण किया  । अपनी पराजय पर वह लेशमात्र भी निराश नहीं था अपितु अपने अपमान का बदला लेना चाहता था।

इतिहासकारों के अनुसार महान प्रतापी राजा पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद ग़ोरी को 17 बार हराया और अपने दयालु व उदार स्वभाव के कारण हर बार उसे माफ कर दिया और जीवित छोड़ दिया  । उधर अपमान की आग में जलते हुए ग़ोरी पृथ्वीराज चौहान से प्रतिशोध का अवसर तलाश रहा था, गौरी ने अपनी सेना को पुनः आक्रमण के लिए संगठित और मजबूत किया  ।

संयोगिता के पिता कन्नौज के राजा जयचंद राठौड़ को जब इस बारे मे पता लगा तो उसने ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त ‘ की नीति के आधार पर ग़ोरी से मित्रता कर ली और पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु का षड्यन्त्र रचने लगे।

मुहम्मद ग़ोरी ने 1192 में विशाल सेना के साथ फिर से पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर दिया, एक बार फिर से तराइन के मैदान पर दोनों सेनाएं आमने-सामने थी  ।

पृथ्वीराज चौहान ने अकेले पड़ जाने के कारण उत्तर भारतीय राजपूत राजाओं से मदद मांगी परंतु संयोगिता के स्वयंवर में पृथ्वीराज चौहान के द्वारा उनका अपमान किया जाने के कारण कोई भी राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान की मदद के लिए आगे नहीं आया  ।

राजा जयचंद के लिए यह एक अच्छा अवसर था, उसने पृथ्वीराज चौहान का विश्वास जीतने के लिए अपनी सेनाएं पृथ्वीराज चौहान को दे दी  । उदार स्वभाव होने के कारण पृथ्वीराज चौहान जयचंद की इस कूटनीति को भाँप नहीं सके, और मौका पाकर जयचंद के सैनिकों ने पृथ्वीराज चौहान के सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया  ।

इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई और मुहम्मद ग़ोरी उन्हें व उनके मित्र चंदबरदाई को बंदी बनाकर अपने साथ गजनी ( अफगानिस्तान ) ले गया। बाद में ग़ोरी ने 1194 में चंदावर के युद्ध में जयचंद को भी मार डाला।

मुहम्मद ग़ोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंपी सत्ता : Muhammad Ghori Handed Over Power to Qutubuddin Aibak

मुहम्मद ग़ोरी तराइन का दूसरा युद्ध जीतने के बाद अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को दोनों राज्यों की सत्ता सौंप गया था  । सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक संयोगिता सहित राजघराने की महिलाओं को अपने आधीन करने अजमेर पहुँचा, परन्तु पृथ्वीराज चौहान का किला बहुत ही मजबूत था।

किले के एक और नदी तथा दूसरी और खाई थी, तथा सामने किले की अभेद्य दीवार थी जिसे तोड़ना बहुत मुश्किल था  । कुतुबुद्दीन ऐबक की लाख कोशिशों के बाद भी राजमहल की स्त्रियों ने दरवाज़ा नहीं खोला, और खुद की इज्ज़त व सम्मान को बचाने के लिए जौहर की तैयारी करने लगीं।

बहुत प्रयासों के बाद दीवार टूटी, कुतुबुद्दीन ऐबक ने भीतर जाकर देखा वहाँ कोई स्त्री नहीं थी बल्कि केवल आग की लपटें ही शेष थीं, सभी क्षत्राणियाँ अपने सतीत्व को बचाने के लिए स्वयं के अस्तित्व को अग्नि को सौंप चुकी थीं।

पृथ्वीराज द्वारा मुहम्मद ग़ोरी का खात्मा : Prithviraj Chauhan kills Muhammad Ghori

गजनी (अफ़ग़ानिस्तान ) में पृथ्वीराज चौहान को मुहम्मद ग़ोरी ने बहुत यातनाएं दी, पृथ्वीराज संयोगिता की मृत्यु की खबर सुनकर भावुक व गुस्से से आक्रोशित हो गए, आँखें नीची ना करने के कारण ग़ोरी ने इसे अपनी शान में गुस्ताखी माना और हुक्म दिया कि लोहे की गर्म सलाखों से उनकी दोनों आँखें जला दी जाएँ।

इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान नेत्रहीन हो गए और उन्हें चंदवरदाई के साथ कारावास में डाल दिया गया। अपने परम मित्र और भारत के महान योद्धा के साथ यह दुर्व्यवहार चंदबरदाई को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा।

तब चंदबरदाई ने अपनी एक योजना के अनुसार मुहम्मद ग़ोरी का विश्वास जीता और उसका विश्वस्त बन गया। बातों ही बातों में 1 दिन चंदबरदाई ने मुहम्मद ग़ोरी को पृथ्वीराज के शब्दभेदी बाण चलाने की कला में महारत के बारे में इस प्रकार वर्णन किया कि गौरी उस कला को देखने के लिए उत्सुक हो गया।

उत्सुकतावश गौरी ने पृथ्वीराज को सभा में बुलाया और उसे अपनी कला का प्रदर्शन करने का हुक्म सुनाया, चंदबरदाई बहुत सूझबूझ वाले व्यक्ति थे उन्होंने चालाकी से पृथ्वीराज चौहान को सांकेतिक भाषा में ये दोहा बोला –

“चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण,

ता ऊपर सुल्तान है मत चूके चौहान।।”

– चंदबरदाई

चंदबरदाई की यह बात सुनकर पृथ्वीराज चौहान ने इस बात का अंदाजा लगा लिया कि सुल्तान मुहम्मद ग़ोरी उनसे 24 गज और 8 अंगुल की दूरी पर बैठा हुआ है, उसकी दूरी का अंदाजा लगाकर पृथ्वीराज चौहान ने तुरंत अपने ‘शब्दभेदी बाण’ से मुहम्मद ग़ोरी का खात्मा कर दिया।

इस तरह चंदबरदाई ने एक सच्चे मित्र की तरह अपने मित्र की मदद करते हुए उस महान भारतीय योद्धा के अपमान का प्रतिशोध ले लिया। उसके तुरंत बाद उन दोनों ने शत्रु के हाथों मरने की अपेक्षा स्वयं ही एक दूसरे को कटार मारकर सम्मानजनक मृत्यु दे दी।

पृथ्वीराज चौहान की समाधि : Samadhi of Prithviraj Chauhan

पृथ्वीराज चौहान का अपमान करने के लिए गजनी के बाहरी क्षेत्र में मुहम्मद ग़ोरी की कब्र तथा पृथ्वीराज चौहान की समाधि को एक साथ बनाया गया है, और ऐसा इसलिए किया गया है कि जब मुस्लिम लोग मुहम्मद ग़ोरी की कब्र पर जाते हैं तो पहले बाहर बनी हुई पृथ्वीराज चौहान की समाधि पर जूते मारते हैं, (इसके लिए वहाँ बाकायदा जूते पहले से ही रखे हैं) और उसके बाद मुहम्मद गौरी की कब्र पर जाकर फूल चढ़ाते हैं।

शेर सिंह राणा (Sher Singh Rana) नाम का एक व्यक्ति जो तिहाड़ जेल में बंद था, जब उसने पृथ्वीराज चौहान की समाधि के साथ अफगानिस्तान में होने वाले दुर्व्यवहार के बारे में सुना तो वह तिहाड़ जेल तोड़कर भाग गया  । भारत से वह नेपाल पहुंचा, नेपाल से बांग्लादेश, और फिर बांग्लादेश से नकली पासपोर्ट के सहारे वह दुबई पहुंच गया, और दुबई से वह अफगानिस्तान पहुंच गया।

वहां उसने रात के अंधेरे में समाधि से पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां लेकर 2005 में भारत वापस लौट आया, स्वदेश पहुंचकर उसने गाजियाबाद के पास पिलखुवा में पृथ्वीराज चौहान का एक मंदिर बनवाया जहां उनकी अस्थियां आज भी सुरक्षित है।

पृथ्वीराज चौहान पर फिल्म जल्द होगी रिलीज़ : Film on Prithviraj Chauhan will be Released Soon

हमारे देश भारत के महान, साहसी राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान की जीवन गाथा पर पर पूर्व में भी कई धारावाहिक बन चुके हैं और जल्द ही ‘पृथ्वीराज’ नाम से एक फिल्म रिलीज होने वाली है जिसमें अभिनेता अक्षय कुमार पृथ्वीराज चौहान की भूमिका निभाते नजर आएंगे।

यह फिल्म 3 जून को सिनेमाघरों में प्रदर्शित की जाएगी। इस फिल्म में, आप विश्व सुंदरी मानुषी छिल्लर को राजकुमारी संयोगिता की भूमिका में देखेंगे, इसके अलावा अभिनेता मानव विज मुहम्मद ग़ोरी की भूमिका में, तथा चंदवरदाई की भूमिका में सोनू सूद हैं, राजा जयचंद की भूमिका को अभिनेता आशुतोष राणा जीवंत करते नज़र आएंगे।

इनके अलावा संजय दत्त  भी प्रमुख भूमिका में नजर आएंगे। फिल्म का निर्माण यशराज फिल्म्स के अंतर्गत निर्माता करन जौहर के द्वारा किया जा रहा हैं, और निर्देशक हैं डॉ0 चन्द्र प्रकाश द्विवेदी

पृथ्वीराज फिल्म के साथ जुड़ा विवाद : Controversy Related to Prithviraj Movie

जैसा कि एतिहासिक फिल्मों का हमेशा विवादों से नाता रहा है, इस फिल्म के साथ भी विवाद जुड़ चुका हैं  । दरअसल फिल्म का ट्रेलर रिलीज होने के बाद राजपूत और गुर्जर समाज के लोगों ने बबाल खड़ा कर दिया है।

मिहिर आर्मी ने फिल्म के निर्माता, निर्देशक को चेतावनी दी है कि एतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़-छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी, साथ ही राजपूत करणी सेना ने फिल्म के नाम ‘पृथ्वीराज’ को अपमानजनक बताते हुए उसे बदलने अन्यथा अंजाम भुगतने की बात कही है।

भारत के अंतिम हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु : Death of Prithviraj Chauhan

महान प्रतापी राजा पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु 11 मार्च 1192 को गजनी, अफ़ग़ानिस्तान में हुई।अफगानिस्तान के गजनी शहर के बाहरी क्षेत्र में पृथ्वीराज चौहान की समाधि आज भी स्थित है, भारत के महान योद्धा व शासक पृथ्वीराज चौहान की समाधि को शैतान बताकर वहां के लोग उनकी समाधि पर जूते मार कर अपमानित करते हैं, इसी कारण से भारत सरकार ने पृथ्वीराज की अस्थियां भारत मंगाने का फैसला किया।

अफगानिस्तान के लोग क्योंकि मुहम्मद ग़ोरी को अपना हीरो मानते हैं अतः वे लोग पृथ्वीराज चौहान को अपना दुश्मन मानते हैं, पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद ग़ोरी की हत्या की थी इसी कारण वो लोग पृथ्वीराज चौहान को घृणा व तिरस्कार की नजरों से देखते हैं  ।

पृथ्वीराज चौहान से जुड़े कुछ रोचक तथ्य : Some Interesting Facts Related to Prithviraj Chauhan

  • पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा, अंतिम हिंदू सम्राट, भारतेश्वर तथा पृथ्वीराज तृतीय के नाम से भी जाना जाता है ।
  • पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण चलाने की कला में पारंगत थे और इसी के द्वारा उन्होंने मुहम्मद ग़ोरी का खात्मा किया।
  • पृथ्वीराज चौहान के घोड़े का नाम नत्यरम्भा था  ।
  • इनकी कुल देवी शाकंभरी माता थीं  ।
  • गद्दी पर बैठने के बाद उन्होंने किला राय पिथौरा का निर्माण किया था  ।
  • 13 साल कि उम्र में उन्होंने गुजरात के पराक्रमी राजा भीमदेव को हरा दिया था  ।
  • चंदवरदाई उनके बचपन के मित्र थे वे उन्हे भाई की तरह मानते थे ।
  • ये दोनों ही एक ही दिन पैदा हुए थे और एक ही दिन उनकी मृत्यु हुई  ।
  • मुहम्मद ग़ोरी ने 1194 में चंदावर के युद्ध में जयचंद को भी मार डाला ।
  • पृथ्वीराज के मित्र चंदबरदाई जो कि उनके राज कवि भी थे, ने पृथ्वीराज के जीवन पर आधारित एक महान महाकाव्य ग्रंथ की रचना की जिसका नाम पृथ्वीराज रासो है, इसमें पृथ्वीराज के संपूर्ण जीवन के बारे में काव्य रचना के माध्यम से बताया गया है।
  • पृथ्वीराज के दरबार में 16 सामंत थे यह इनके दरबार की शान हुआ करते थे।
  • पृथ्वीराज के साले चामुंडराय के हाथों एक बार उनका प्रिय हाथी श्रंगारहार मारा गया जिसके कारण नाराज होकर पृथ्वीराज ने उससे उसके अस्त्र छीन लिए ।
  • पृथ्वीराज चौहान ने अनहिलपाटण के राजा भीमदेव को हराया था।
  • जेजाकभुक्ति के राजा परमर्दिदेव/परमाल चंदेल को भी पृथ्वीराज चौहान ने युद्ध में हराया था।

FAQ

प्रश्न- पृथ्वीराज चौहान का जन्म कब और कहां हुआ?

उत्तर- पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1166 में गुजरात के पाटन में हुआ था।

प्रश्न – पृथ्वीराज चौहान का साम्राज्य कौन सा था ?

उत्तर– पृथ्वीराज चौहान अजमेर एवं दिल्ली के राजा थे ।

प्रश्न– पृथ्वीराज चौहान तथा मुहम्मद ग़ोरी के बीच कितने युद्ध हुए?

उत्तर – पृथ्वीराज चौहान तथा मुहम्मद ग़ोरी के बीच 18 लड़ाइयाँ लड़ी गईं।

प्रश्न – पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि (राजकवि) का नाम क्या था ?

उत्तर – पृथ्वीराज के बचपन के मित्र चंदबरदाई उनके राजकवि थे, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान की आत्मकथा पृथ्वीराज रासो ग्रंथ में लिखी है।

प्रश्न – राजकुमारी संयोगिता किसकी पुत्री थी ?

उत्तर– राजकुमारी संयोगिता कन्नौज के राजपूत राजा जयचंद की पुत्री थी।

प्रश्न– पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु कैसे हुई?

उत्तर– तराइन के द्वितीय युद्ध में पराजय के बाद उन्हें गजनी ले जाया गया, वहां पर ही शब्दभेदी बाण से गौरी को मारने के बाद उनके मित्र चंदबरदाई तथा पृथ्वीराज ने एक दूसरे के प्राण लेकर अपना सम्मानजनक अंत कर दिया।

प्रश्न– पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु हो जाने के बाद उनकी रानी संयोगिता का क्या हुआ ?

उत्तर– कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद रानी संयोगिता ने राज महल की अन्य क्षत्राणियों के साथ स्वयं को अग्नि में समर्पित कर जोहर कर लिया था।

निष्कर्षconclusion

दोस्तों, हमारे देश के महान पराक्रमी, शूरवीर और अंतिम हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान की वीरता के अनगिनत किस्से भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में लिखे हुए हैं, उनकी वीरता को शब्दों में पिरोकर एक कागज पर लिख पाना नामुमकिन है फिर भी हमने उनके जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को अपने लेख में संकलित करने का प्रयास किया है।

हालांकि कुछ चीजों को लेकर इतिहासकारों के विभिन्न मत हैं जैसे कि उन्होंने मुहम्मद ग़ोरी से 18 बार युद्ध किया, इतिहास में कहीं-कहीं गोरी के साथ उनके केवल 2 युद्धों का ही वर्णन है, फिर भी हमारी जानकारी से परे उनके जीवनकाल के बारे में यदि कोई अन्य जानकारी आपको है तो कमेंट बॉक्स में लिखकर हमें अवश्य बताइएगा।

तो दोस्तों ये थी  Prithviraj Chauhan Biography in Hindi, History  । पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय, इतिहास  पोस्ट । हमें आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आपको ये लेख पसंद आया होगा ।

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