सुभाष चंद्र बोस की जीवनी | Netaji subhas Chandra bose jayanti, कहानी, जयंती 2023

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।”

-सुभाष चंद्र बोस

भारत के स्वाधीनता संग्राम के समय देश के महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ( Netaji Subhash Chandra Bose) के द्वारा बोले गए यह शब्द उस दौर में आजादी के मतवालों के लिए अपार प्रेरणा का श्रोत बन चुके थे। इसके अलावा नेता जी ने ‘जय हिंद’ का नारा भी दिया था जो बाद में हमारे देश का राष्ट्रीय नारा बन गया।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नेताओं में से थे। सुभाष चंद्र बोस अपनी ICS (Indian Civil Services) की नौकरी छोड़कर देश वापस लौट आए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़कर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए । नेता जी ने द्वितीय विश्व युद्ध के समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने के लिए आजाद हिंद फौज का गठन किया,  इसके लिए उन्होंने जापान से मदद ली।

उन्होंने सिंगापुर में ‘आजाद हिंद फौज के सुप्रीम कमांडरके रूप में सेना को संबोधित करते हुए ‘दिल्ली चलोका नारा दिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जापान के सहयोग से दो बार अंग्रेजी सेना से युद्ध किया और भारत के कुछ क्षेत्रों को अंग्रेजों से आजाद करा लिया परंतु दूसरी बार कोहिमा के युद्ध में जापान की सेना पीछे हट गई और यही घटना निर्णायक साबित हुई।

नेताजी की विमान दुर्घटना में मृत्यु की खबर आज भी विवादास्पद है। एक ओर जहां हर साल 18 अगस्त को जापान में नेताजी का शहीदी दिवस मनाया जाता है। वहीं दूसरी ओर नेता जी के परिवार के लोगों का मानना था कि उस वक्त नेताजी की मृत्यु नहीं हुई थी।

नेताजी की मृत्यु का विवाद कुछ भी रहा हो परंतु उनके बारे में यह शाश्वत सत्य है कि उन्होंने भारत के स्वाधीनता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दोस्तों, आइए आज हम इस महान क्रांतिकारी, भारत माता के सच्चे सपूत के जीवन के बारे में इस लेख सुभाष चंद्र बोस की जीवनी | Netaji subhas Chandra bose jayanti, कहानी, जयंती 2023 में विस्तार से चर्चा करेंगे। आपसे अनुरोध है इस पोस्ट को अंत तक अवश्य पढ़ें।

Topics Covered in This Page

सुभाष चंद्र बोस की जीवनी | Netaji subhas Chandra bose jayanti, कहानी, जयंती 2023

बिन्दु जानकारी
नामसुभाष चंद्र बोस
पूरा नाम सुभाष चंद्र जानकीनाथ बोस
अन्य नाम नेताजी
जन्म 23 जनवरी 1897
जन्म स्थान कटक, उड़ीसा डिवीजन, बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
शिक्षा (प्रारम्भिक) रेवेंशॉव कोलेजिएट स्कूल कटक
बी0ए0 (ऑनर्स) प्रेसिडेंसी कॉलेज, स्कॉटिश चर्च कॉलेज, कलकत्ता
ICS (इंडियन सिविल सर्विसेस) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड
धारित पद सुप्रीम कमांडर ( आजाद हिंद फौज ) 
अध्यक्ष- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस(1938,1939)
मेयर – कलकत्ता महापालिका (1930-31)
विवाह की तारीख 1937
प्रसिद्धि का कारणभारतीय स्वाधीनता संग्राम के महान नेता, आजाद हिन्द फौज के संस्थापक
संगठन आजाद हिंद फौज
ऑल इंडिया नेशनल ब्लॉक फॉरवर्ड
स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार
राजनीतिक पार्टियांINC ( भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) 1921 से 1940
फॉरवर्ड ब्लॉक 1939 से 1940
मृत्यु 18 अगस्त 1945 जापान ( 48 वर्ष )
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सुभाष चंद्र बोस का जन्म, एवं प्रारंभिक जीवन – Subhash Chandra Bose Birth and Early Life

सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) का जन्म उड़ीसा के कटक शहर में एक हिंदू कायस्थ परिवार में 23 जनवरी 1897 को हुआ था। उनके पिता जानकीनाथ बोस कटक के एक प्रसिद्ध सरकारी वकील थे। जिन्होंने बाद में प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उनकी माता का नाम प्रभावती था।

नेताजी के पिता बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें रायबहादुर का खिताब भी मिला था। जानकीनाथ बोस की 14 संताने थीं। जिनमें 8 पुत्र और 6 पुत्रियां थीं। सुभाष चंद्र बोस अपने माता-पिता की नौवीं संतान थे। तथा पुत्रों में उनका नंबर पांचवा था। अपने बड़े भाई शरदचंद्र बोस से वे बहुत प्यार करते थे।

सुभाष चंद्र बोस की जीवनी
सुभाष चंद्र बोस

सुभाष चंद्र बोस का परिवार- Subhash Chandra Bose Family Information

दोस्तों सुभाष चंद्र बोस की जीवनी में आपको उनके सम्पूर्ण परिवार का परिचय दे रहे हैं –

संबंध नाम
पिता जानकीनाथ बोस
माता प्रभावती देवी बोस
भाई शरदचंद्र बोस
भतीजेशिशिर कुमार बोस
पत्नी एमिली शेंकल
बेटी अनिता बोस फाफ
दामाद मार्टिन फाफ
नाती पिटर अरुण, थॉमस कृष्ण
नातिन माया कैरीना

नेताजी की शिक्षा-दीक्षा – Subhash Chandra Bose Education

सुभाष चंद्र बोस की प्राइमरी तक की शिक्षा कटक के प्रोटेस्टेंट स्कूल से पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने रेवेंशॉव कोलेजिएट स्कूल कटक में 1909 में एडमिशन लिया। केवल 15 वर्ष की आयु में ही सुभाष चंद्र बोस ने स्वामी विवेकानंद के संपूर्ण साहित्य का अध्ययन कर लिया था। वे उनसे बहुत प्रभावित थे और स्वामी विवेकानन्द को अपना गुरु मानते थे।

उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा 1915 में द्वितीय श्रेणी में पास की। उन्होंने बी0ए0 ( ऑनर्स) की परीक्षा 1919 में प्रथम श्रेणी में पास की और कलकत्ता विश्वविद्यालय में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। सुभाष चंद्र बोस के पिता उन्हें आईसीएस के रूप में देखना चाहते थे, अतः वे अपने पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए 15 सितंबर 1919 को इंग्लैंड चले गए। वहां उन्होंने उस परीक्षा के लिए बहुत मेहनत की और 1920 में आईसीएस परीक्षा सूची में चौथा स्थान प्राप्त करके पास की।

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भारतीय स्वाधीनता संग्राम में नेताजी का प्रवेश और उनके कार्य –

अपने छात्र जीवन से ही सुभाष चंद्र बोस कलकत्ता के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चितरंजन दास की देशभक्ति और स्वाधीनता आंदोलन के अंतर्गत किए कार्यों से प्रेरित थे और उनके साथ काम करने के इच्छुक थे। इसीलिए उन्होंने इंग्लैंड से ही चितरंजन दास जी को पत्र लिखकर उनके साथ काम करने की इच्छा जताई थी। देश को स्वतंत्र देखना उनका सपना था, वे अंग्रेजों की नौकरी नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने ICS की नौकरी छोड़ दी और स्वदेश वापस लौट आए।

1921 में देश वापसी के बाद महात्मा गांधी से मिलने के लिए वे सीधे मुंबई गए और उनसे मुलाकात की। गांधीजी की सलाह पर कोलकाता जाकर वे चितरंजन दास से मिले। महात्मा गांधी ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ उन दिनों असहयोग आंदोलन चलाया हुआ था जिसका नेतृत्व बंगाल में चितरंजन दास कर रहे थे। सुभाष चंद्र बोस इस आंदोलन में चितरंजन दास का सहयोग करने लगे।

बाद में चितरंजन दास ने स्वराज पार्टी बनाई। फिर चितरंजन दास ने महापालिका का चुनाव जीता और कलकत्ता के मेयर बन गए, और सुभाष चंद्र बोस को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बना दिया।सुभाष चंद्र बोस ने कोलकाता के सड़कों के अंग्रेजी नाम बदल कर भारतीय नाम रखें, स्वतंत्रा सेनानियों के परिवारजनों को महापालिका में नौकरी दिलाई, और अपने इन कामों से वह जल्द ही देश में एक प्रसिद्ध नेता बन गए।

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सुभाष चंद्र बोस ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी में युवाओं की इंडिपेंडेंस लीग बनाई। 1927 में जब साइमन कमीशन के आगमन का विरोध हुआ तब इस मिशन की कमान कोलकाता में सुभाष चंद्र बोस ने संभाली।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन 1928 में कोलकाता में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ। सुभाष चंद्र बोस ने वर्दी पहन कर इस अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू को एक सैनिक की तरह से सलामी दी। महात्मा गांधी सुभाष चंद्र बोस तथा जवाहरलाल नेहरू की पूर्ण स्वराज की मांग से सहमत नहीं थे, अतः सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए 1 साल का समय दिया गया। परंतु अंग्रेजों ने 1 साल बाद भी यह मांग पूरी नहीं की।

1930 के कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अध्यक्षता की। यह अधिवेशन लाहौर में संपन्न हुआ और इसमें निश्चय किया गया कि 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। सुभाष चंद्र बोस कोलकाता में 26 जनवरी 1931 को राष्ट्रीय ध्वज फहराकर एक बड़ी रैली का नेतृत्व कर रहे थे, उसी समय पुलिस ने लाठी चार्ज करके नेताजी को घायल कर दिया और जेल भेज दिया।

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गांधीजी ने अंग्रेज सरकार से वार्ता करके सुभाष चंद्र बोस सहित सभी बंदियों को छुड़वा लिया। परंतु अंग्रेज सरकार ने सरदार भगत सिंह और उनके साथियों को रिहा करने से इनकार कर दिया। गांधी जी ने भगत सिंह को छुड़ाने के लिए बड़ी नरमी के साथ अंग्रेज सरकार से वार्ता की और वे नहीं माने।

नेताजी चाहते थे गांधीजी अंग्रेज सरकार से समझौता तोड़ दें, परंतु गांधीजी अपना दिया गया वचन तोड़ने के लिए सहमत नहीं थे। अंततः सरदार भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई। भगत सिंह को फांसी से नहीं बचा पाने के कारण सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी और कांग्रेस की विचारधारा से नाराज हो गए थे।

सुभाष चंद्र बोस की जीवनी
नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर जारी डाक टिकट

नेताजी को मिले कारावास –

अपने जीवन काल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को 11 बार कारावास (जेल की सजा) हुआ। उन्हें अपने जीवन में सबसे पहली बार 16 जुलाई 1921 में 6 महीने की सजा हुई। इसके बाद अंग्रेज सरकार ने गोपीनाथ साहा नामक क्रांतिकारी की फांसी की सजा के बाद, अकारण ही नेताजी को गिरफ्तार करके म्यांमार के मांडले जेल में अनिश्चित काल के लिए बंदी बनाकर भेज दिया।

1925 में देशबंधु चितरंजन दास की मृत्यु के बाद, मांडले जेल में तपैदिक होने के कारण सुभाष बाबू की तबीयत ज्यादा खराब होने पर अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल से रिहा कर दिया और वे डलहौजी में इलाज के लिए चले गए।

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1930 में सुभाष चंद्र बोस ने जेल से ही कोलकाता महापौर का चुनाव लड़ा, और वे चुनाव जीतकर कोलकाता के महापौर बने, अंग्रेज सरकार को फिर से मजबूरन उन्हें रिहा करना पड़ा। सुभाष चंद्र बोस को 1932 में फिर से सजा हुई इस बार उन्हें अल्मोड़ा की जेल में रखा गया। जेल में उनकी तबीयत खराब हो जाने से डॉक्टर की सलाह पर वे इस बार इलाज के लिए यूरोप जाने को तैयार हो गये।

नेताजी की यूरोप यात्रा – Europe Journey of Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चंद्र बोस (netaji subhash chandra bose) 1933 से 1936 तक यूरोप में ही रहे। इन दिनों नेता जी ने अपने स्वास्थ्य का पूरी तरह ख्याल रखा, और अपना काम रुकने नहीं दिया। इसी दौरान नेताजी मुसोलिनी, जो कि इटली के नेता थे, से मिले। मुसोलिनी ने सुभाष चंद्र बोस को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हर संभव सहायता का वचन दिया।

अपने यूरोप प्रवास के दौरान सुभाष चंद्र बोस विट्ठल भाई पटेल से भी मिले। विट्ठल भाई पटेल के साथ उनकी यह वार्ता पटेल-बोस विश्लेषण के नाम से जानी गई। 1934 में सुभाष चंद्र बोस को अपने पिता की तबीयत गंभीर रूप से खराब होने की सूचना मिली, यह सुनते ही वह कोलकाता अपने घर वापस लौट आए। परंतु उनके कोलकाता पहुंचते ही अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर यूरोप वापस भेज दिया।

सुभाष चंद्र बोस ने ऑस्ट्रिया में किया प्रेम विवाह – Subhash Chandra Bose Marriage

सुभाष चंद्र बोस 1934 में अपने इलाज के दौरान ऑस्ट्रिया में ठहरे हुए थे। उन दिनों वे एक पुस्तक लिख रहे थे जिसके लिए उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो अंग्रेजी टाइपिंग जानता हो। उनके किसी मित्र ने एक ऑस्ट्रियन महिला से उनकी मुलाकात कराई। उस महिला का नाम एमिली शेंकल (Emilie Schenkl) था।

धीरे-धीरे नेताजी और एमिली के बीच नजदीकियां बढ़ गईं और 1937 में उन्होंने हिंदू रीति रिवाज से एमिली के साथ विवाह कर लिया। एमिली ने वियना में एक पुत्री को जन्म दिया नेता जी ने उसका नाम अनीता बोस रखा। नेताजी की पुत्री अभी जीवित है और उसका पूरा नाम अनिता बोस फाफ है, वह अपने परिवार के साथ जर्मनी में रहती हैं, और अपने पिता के परिवार से मिलने यदा-कदा भारत आती हैं।

हरिपुरा कांग्रेस का अध्यक्ष पद एवं उससे इस्तीफा –

कांग्रेस का 51 वां वार्षिक अधिवेशन हरिपुरा में होना निश्चित हुआ। इस अधिवेशन के अध्यक्ष के लिए महात्मा गांधी जी ने सुभाष चंद्र बोस को चुना। कांग्रेस का 51 वाँ अधिवेशन होने के कारण सुभाष चंद्र बोस का स्वागत एक ऐसे रथ में किया गया जिसे 51 बैल खींच रहे थे।

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गांधी जी और नेताजी के विचार आपस में नहीं मिलते थे, फिर भी नेताजी उनका बहुत सम्मान करते थे, वे ये मानते थे की हम दोनों का मकसद एक ही है। पहली बार उन्होंने ही गांधीजी को राष्ट्रपिता कहा।

कांग्रेस के अधिवेशन में नेताजी का भाषण बहुत प्रभावशाली रहा। वास्तव में यह भाषण अभूतपूर्व था। सुभाष चंद्र बोस ने अपने कार्यकाल में योजना आयोग की स्थापना की और जवाहरलाल नेहरू को उसका अध्यक्ष बनाया गया। प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर विश्वेश्वरैया की अध्यक्षता में सुभाष चंद्र बोस ने बंगलोर में विज्ञान परिषद की स्थापना की।

1938 में भले ही गांधी जी ने सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुना था परंतु उन्हें सुभाष चंद्र बोस की कार्यशैली पसंद नहीं आई। उन्हीं दिनों द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो जाने पर नेताजी चाहते थे कि इंग्लैंड की कठिनाइयों के उन दिनों में भारत के स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों को और तेज कर दिया जाए उन्होंने उस तरफ कदम भी बढ़ाये परंतु गांधीजी इस से बिल्कुल सहमत नहीं थे।

1939 में कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुनने के समय नेताजी को कोई निर्भीक व्यक्ति ना मिलने के कारण स्वयं ही अध्यक्ष बने रहना चाहते थे, परंतु गांधीजी उनकी जगह किसी अन्य को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। देश के कई वरिष्ठ नेताओं के कहने पर भी गांधीजी नहीं माने उन्होंने पट्टाभि सीतारमैय्या को चुनाव में खड़ा किया। परंतु फिर भी सुभाष चंद्र बोस 203 मतों से चुनाव जीत गये। गांधी जी को यह हार बर्दाश्त नहीं थी।

कांग्रेस का 1939 का वार्षिक अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ था। सुभाष चंद्र बोस इस समय गंभीर रूप से बुखार से पीड़ित थे, उसके बाद भी वे अधिवेशन में पहुंचे, उन्हें गांधीजी और उनके साथियों ने कोई सहयोग नहीं किया। नेता जी ने उन्हें समझाने के बहुत प्रयास किए परंतु अंत में, परेशान होकर उन्होंने 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया।

नेता जी ने की फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना -Establishment of Forward Block

सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस में रहते हुए ही 3 मई 1939 को फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी एक नई पार्टी की स्थापना की, परंतु कुछ दिनों के बाद सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस पार्टी से भी निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप में एक स्वतंत्र पार्टी बन चुकी थी।

ब्रिटेन और जर्मनी के बीच युद्ध शुरू होने पर फॉरवर्ड ब्लॉक ने अपनी गतिविधियां तेज कर दीं और कोलकाता में स्थित हालवेट स्तंभ ( गुलामी का प्रतीक) को रात-रात में नेस्तनाबूत कर दिया।यह एक शुरूआत थी और इस के माध्यम से अंग्रेज सरकार को यह संकेत दिया गया, कि इसी तरह ब्रिटिश शासन की जड़ों को उखाड़ फेंका जाएगा।

इस घटना के बाद अंग्रेज सरकार ने नेताजी और उनके साथियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। नेता जी ने जेल में आमरण अनशन किया, उनकी हालत खराब होने पर सरकार ने उन्हें मजबूरन रिहा कर दिया। परंतु अंग्रेज सरकार ने उन्हें उनके घर पर ही नजरबंद करके बाहर पुलिस का पहरा लगा दिया।

नजर बंद होने के बाद भी नेताजी ने चकमा दिया –

नेताजी इस समय घर में बंद होकर समय बर्बाद करना नहीं चाहते थे, अतः उन्होंने एक योजना बनाई। वे पुलिसकर्मियों को चकमा देकर 16 जनवरी 1941 को मोहम्मद जियाउद्दीन नाम के एक पठान के वेश में अपने घर से बाहर निकले। उनके भतीजे शिशिर ने उन्हें गाड़ी में बैठाकर झारखंड प्रांत के धनबाद जिले में गोमोह नामक स्थान तक पहुंचा दिया।

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गोमोह रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर नेताजी पेशावर पहुंच गए। फिर नेताजी अपने साथियों की मदद से काबुल चले गए। वहाँ जर्मनी और इटालियन दूतावासों की मदद से काबुल से मास्को होते हुए वे जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुंच गए।

नेताजी का जर्मनी प्रवास और एडोल्फ हिटलर से मुलाकात –

सुभाष चंद्र बोस बर्लिन में वहां के कई प्रभावशाली नेताओं से मिले। जर्मनी में उन्होंने आजाद हिंद रेडियो तथा भारतीय स्वतंत्रता संगठन की स्थापना की। सुभाष चंद्र बोस इन दिनों नेताजी के नाम से प्रसिद्ध होने लगे। 29 मई 1942 को सुभाष चंद्र बोस ने एडोल्फ हिटलर से मुलाकात की।

हिटलर ने नेताजी और उनके भारत की आजादी के मिशन में खास मदद न दे पाने की बात कही क्योंकि जर्मनी से भारत की दूरी बहुत अधिक थी। परंतु उसने कहा कि जापान भारत के करीब है अतः आप जापान चले जाओ वहां से आपको अपनी गतिविधियां कार्यान्वित करने में सुविधा रहेगी।

मैं जापान से आपकी मदद की बात करूंगा। फिर हिटलर ने उन्हें एक पनडुब्बी से पूर्वी एशिया की ओर रवाना कर दिया। मेडागास्कर में नेता जी जर्मनी की पनडुब्बी से जापान की पनडुब्बी में पहुंच गए और फिर जापानी पनडुब्बी से इंडोनेशिया के पादांग बंदरगाह तक पहुंचे।

आजाद हिन्द फौज का गठन – Establishment of Indian National Army

पूर्व एशिया में नेताजी सिंगापुर में रासबिहारी बोस से मिले, एडवर्ड पार्क में वयोवृद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस ने नेताजी को आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व सौंप दिया। फिर नेताजी जापान के प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो से मिले वह नेता जी से मिलकर बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें हर संभव मदद का आश्वासन दिया।

नेताजी ने सिंगापुर में 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद फौज की स्थापना की। वे स्वयं आजाद हिंद फौज के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और रक्षा मंत्री थे। नेता जी ने जापानी सेना द्वारा अंग्रेजों की फौज में भर्ती भारतीय युद्ध बंदी सैनिकों को आजाद हिंद फौज में शामिल किया। इस आर्मी को उस समय 9 देशों ने मान्यता दी थी। नेता जी ने ‘झांसी की रानी रेजीमेंट’ के नाम से आजाद हिंद फौज में महिलाओं की भी एक रेजीमेंट बनाई।जिसकी कैप्टन लक्ष्मी सहगल थीं।

नेता जी ने पूर्वी एशिया के देशों में रहने वाले भारतीयों को INA (Indian National Army) में भर्ती होने तथा आर्थिक मदद देने का आह्वान किया। अपने एक संदेश में उन्होंने नारा दिया – “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।”

जापानी सेना का सहयोग लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के समय आजाद हिंद फौज ने भारत में अंग्रेजी फौज पर आक्रमण किया। इसी समय नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी आर्मी का मनोबल बढ़ाने के लिए “दिल्ली चलो” का नारा दिया।

आजाद हिंद फौज और जापानी सेना ने मिलकर अंग्रेजों से अंडमान और निकोबार द्वीप जीत लिए और सुभाष चंद्र बोस ने इनको नया नाम दिया- “शहीद द्वीप” और “स्वराज द्वीप”। इसके बाद इंफाल और कोहिमा पर दोनों सेनाओं ने आक्रमण किया परंतु अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा देने के कारण, विवशतावश जापान को पीछे हटना पड़ा। जापानी सेना ने उस वक्त नेताजी के वहां से निकलने का प्रबंध किया, परंतु उन्होंने झांसी की रानी रेजीमेंट की महिलाओं के साथ मीलों पैदल जाना पसंद किया।

आजाद हिंद रेडियो पर नेता जी ने 6 जुलाई 1944 को गांधीजी को संबोधित करते हुए आईएनए की स्थापना का उद्देश्य और जापान से मदद लेने का उद्देश्य बताया और गांधी जी को राष्ट्रपिता कह कर पुकारा उसी दौरान गांधी जी ने भी सुभाष चंद्र बोस को नेताजी कहा।

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विमान दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु की खबर – Subhash Chandra Bose Death

अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु बम गिराने के बाद द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय हुई। इसके बाद नेताजी को जापान से मिलने वाली सहायता के रास्ते बंद हो चुके थे। अब नेताजी को कुछ और सोचना था। उन्होंने फैसला किया कि वे रूस से सहायता मांगेंगे। फिर 18 अगस्त 1945 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्लेन द्वारा मंचूरिया की ओर जा रहे थे कि रास्ते से ही वह लापता हो गए, और उस दिन के बाद से फिर कभी दिखाई नहीं दिए।

फिर 23 अगस्त को टोक्यो के एक रेडियो पर बताया गया कि नेताजी का विमान ताईहोकू हवाई अड्डे के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, इस दुर्घटना में उनके साथ जापानी जनरल, पायलट और कुछ अन्य लोग भी मारे गए। नेताजी का शरीर इस दुर्घटना में बुरी तरह से जल चुका था उन्हें ताईहोकू के सैनिक अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

कहा जाता है कि ताईहोकू में ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। और बाद में उनकी अस्थियों को टोकियो (जापान) के रैंकोंजी मंदिर में रख दिया गया। भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध दस्तावेजों से यह ज्ञात होता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को ही रात्रि 9:00 बजे ताईहोकू के सैनिक अस्पताल में हुई थी।

नेताजी की मौत के रहस्य की जाँच के लिए गठित आयोग –

देश आजाद होने के बाद भारत सरकार ने नेताजी की मौत के रहस्य की जांच करने के लिए दो बार अलग-अलग 1956 और 1977 में आयोग की नियुक्ति की। परंतु दोनों ही आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसी बात का जिक्र किया कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना के दौरान हुई।

एक बार फिर 1999 में सरकार ने तीसरा आयोग मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में गठित किया। उनकी जांच में इस बात का खुलासा हुआ कि 1945 में ताइवान सरकार के अनुसार कोई विमान दुर्घटना नहीं हुई थी। इस आयोग ने सरकार को अपनी रिपोर्ट 2005 में सौंपी जिसमें कहां गया कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं मिलता है। भारत सरकार के द्वारा इस आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया गया।

और इसी के साथ देश के महान क्रांतिकारी नेता का अंतिम सफर कभी ना सुलझने वाली गुत्थी बनकर रह गया। आज भी अलग-अलग जगहों से लोग नेता जी को मिलने का दावा करते रहते हैं। फैजाबाद के गुमनामी बाबा और छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के जैसे कई दावे समय-समय पर सामने आते रहे जिस में नेताजी के जीवित होने की बात कही गई। परंतु इन सब दावों का कोई पुख्ता प्रमाण कभी नहीं मिला।

नेताजी की मृत्यु के रहस्य की सुनवाई के लिए किया गया विशेष पीठ का गठन-

कोलकाता हाई कोर्ट में ‘इंडियाज स्माइल’ नामक सरकारी संगठन ने याचिका लगाई है जिसमें नेताजी के लापता होने के रहस्यों से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग की गई, इसके जवाब में कोलकाता हाईकोर्ट ने एक विशेष बेंच गठित करने का आदेश दिया है।

कोलकाता हाईकोर्ट में दाखिल की गई याचिका में प्रधानमंत्री के निजी सचिव, रक्षा सचिव, खुफिया विभाग, रॉ , राष्ट्रीय सलाहकार परिषद, भारत संघ, पश्चिम बंगाल सरकार और गृह विभाग सहित कई लोगों को प्रतिवादी बनाया गया है।

सुभाष चंद्र बोस जयंती, 23 जनवरी (पराक्रम दिवस) – Subhash Chandra Bose Birthday (Parakram Diwas)

21 अक्टूबर 2018 को आजाद हिंद फौज की स्थापना को 75 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इस अवसर पर देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भारत के इतिहास में पहली बार लाल किले पर तिरंगा फहराया। 23 जनवरी 2021 को नेता जी के जन्मदिवस पर देश में उनकी 125 वीं जयंती मनाई गई।

भारत सरकार के निर्णय के अनुसार नेताजी के जन्मदिवस को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाया गया। इसी क्रम में 8 सितंबर 2022 को दिल्ली के राजपथ पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विशाल प्रतिमा का अनावरण किया गया, साथ ही राजपथ का नाम परिवर्तन करके ‘कर्तव्य पथ’ किया गया।

FAQ

प्रश्न – सुभाष चंद्र बोस का जन्म कब और कहां हुआ ?

उत्तर – सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक, उड़ीसा डिवीजन, बंगाल प्रेसीडेंसी में ब्रिटिश भारत में हुआ था।

प्रश्न – सुभाष चंद्र बोस का पूरा नाम क्या है ?

उत्तर – नेताजी सुभाष चंद्र बोस

प्रश्न – सुभाष चंद्र बोस के माता पिता का क्या नाम था ?

उत्तर – सुभाष चंद्र बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था।

प्रश्न – सुभाष चंद्र बोस की पत्नी का नाम क्या है ?

उत्तर – सुभाष चंद्र बोस की पत्नी का नाम एमिली शेंकल है।

प्रश्न – नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कितने बच्चे थे ?

उत्तर – सुभाष चंद्र बोस की केवल एक बेटी हैं।

प्रश्न –सुभाष चंद्र बोस की बेटी का क्या नाम है ?

उत्तर – सुभाष चंद्र बोस की बेटी का नाम अनिता बोस फाफ है।

प्रश्न –सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्रता संग्राम में क्या योगदान दिया?

उत्तर – सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देने के लिए अपनी आईसीएस की नौकरी छोड़कर भारत वापस लौट आए। उन्होंने देश के बाहर जाकर स्वाधीनता संग्राम को मजबूती देने के लिए आजाद हिंद फौज की स्थापना की, और देश की आजादी के लिए दुनिया के देशों से समर्थन जुटाया।

प्रश्न –सुभाष चंद्र बोस का रहस्य क्या था?

उत्तर – 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु की बात कहीं जाती है। परंतु उनकी मृत्यु का रहस्य आज भी एक अनसुलझा सवाल बना हुआ है, 18 अगस्त 1945 को जापान अधिकृत ताइवान में उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था, इसमें वे जीवित बचे या नहीं यह सवाल आज भी एक रहस्य है।

प्रश्न –सुभाष चंद्र बोस की जीवनी का क्या नाम है?

उत्तर – सुभाष चंद्र बोस की जीवनी का नाम है – ‘एन इंडियन पिलग्रिम: एन अनफिनिश्ड ऑटोबायोग्राफी’  यह आत्मकथा दो खंडों में लिखी गई है 1948 में पहली बार इसे थैकर स्प्रिंक एंड कंपनी ने प्रकाशित किया था।

प्रश्न – नेताजी की मृत्यु कैसे हुई ?

उत्तर – सर्वविदित है कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को एक हवाई दुर्घटना में ताइवान में हुई थी।

प्रश्न – सुभाष चंद्र बोस को किसने मारा ?

उत्तर- सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में ताइवान में हुई थी। हालांकि उनकी मृत्यु का विषय एक रहस्य है, और अभी तक विवादित है ।

हमारे शब्द – Our Words

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