गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय | गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2022

श्री गुरु हरगोविंद जी के पांचवें पुत्र श्री गुरु तेग बहादुर का जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। सिक्खों के आठवें गुरु श्री हरिकृष्ण राय जी की मृत्यु के बाद आप जी को 20 मार्च 1665 को सिक्खों का नौवां गुरु बनाया गया और आप 24 नवम्बर 1675 तक गुरु गद्दी पर आसीन रहे। श्री गुरु तेग बहादुर जी ने ‘आनंदपुर साहिब’ का निर्माण कराया था और उसके बाद आप वहीं निवास करने लगे।

श्री गुरु तेग बहादुर जी बचपन से ही निडर, साहसी, और बहादुर थे, वे एक कवि, विचारक, शिक्षक और एक महान योद्धा भी थे। आपने अपने पिता के साथ मात्र 14 वर्ष की आयु में मुगलों के खिलाफ हुए युद्ध में अपनी वीरता और शौर्य प्रदर्शित किया था, गुरु तेग बहादुर जी की वीरता से प्रसन्न होकर उनके पिता ने उन्हें तेग बहादुर नाम से नवाजा जिसका अर्थ होता है ‘तलवार के धनी’

श्री गुरु तेग बहादुर जी ने मुगल शासक औरंगजेब के अमानवीय अत्याचारों के खिलाफ कभी खुद को झुकने नहीं दिया और इस्लाम स्वीकार नहीं किया, जवाब में उन्होंने कहा, “शीश कटा सकते हैं केश नहीं।”

औरंगजेब द्वारा जबर्दस्ती इस्लाम में धर्मांतरण का इन्होंने पुरजोर विरोध किया, जिसके कारण औरंगजेब ने दिल्ली के चाँदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी का शीश कटवाकर उन्हें शहीद कर दिया। उनके शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा “श्री शीशगंज साहिब” स्थित है।

गुरु तेग बहादुर जी वास्तव में मानवता के सच्चे रक्षक थे और अपने त्याग व बलिदान के कारण ही वे हिन्द दी चादर” कहलाए।

दोस्तों, आइए आज हम आपको त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति श्री गुरु तेग बहादुर जी के जीवन से जुड़ी प्रत्येक जानकारी अपने इस लेख गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय | गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2022 में देने जा रहे हैं, आपसे अनुरोध है कि पोस्ट को अंत तक अवश्य पढ़ें। तो आइए दोस्तों शुरू करते हैं गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय

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गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय | गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2022

बिन्दु जानकारी
गुरु का नामगुरु तेग़ बहादुर
वास्तविक नामत्याग मल
उपनाम/उपाधि “हिन्द दी चादर”
जन्म की तारीख 1 अप्रैल 1621
जन्म स्थल मुगलकालीन लाहौर सूबे का अमृतसर ( वर्तमान में पंजाब, भारत)
गृह नगर अमृतसर, पंजाब, भारत
उम्र (शहीदी के समय) 54 साल
गुरु पद की प्राप्ति 20 मार्च 1665
गुरु जी का कार्यकाल 1665 से 1675 तक
प्रसिद्धि सिक्खों के नौवें गुरु
आनंदपुर व पटियाला के संस्थापक
वैवाहिक स्थितिविवाहित
विवाह की तारीख4 फरवरी 1632
धर्म सिक्ख
शहीदी की तारीख24 नवंबर 1675
शहीदी का स्थान चाँदनी चौक, दिल्ली, भारत ( मुगल साम्राज्य में)
शहीदी का कारण औरंगजेब के आदेश पर इस्लाम कबूल न करना
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गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय, जन्म एवं परिवार – Guru Teg Bahadur Ji Birth and Family

सिक्ख धर्म के 9 वें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। इनका बचपन का नाम त्याग मल था। श्री गुरु तेग बहादुर जी के पिता सिक्ख धर्म के छठवें गुरु थे। इनके पूरे परिवार का परिचय निम्न प्रकार है –

पिता का नाम श्री गुरु हरगोबिन्द
माता का नाममाता नानकी
भाईयों के नाम सूरज मल, बाबा गुरदित्त, अनी राय एवं अटल राय
बहन का नाम बीबी वीरो
पत्नी का नाम माता गूजरी चंद सुभीखी
पुत्र का नाम गुरु गोविंद सिंह

गुरु तेग बहादुर जी की शिक्षा एवं प्रारम्भिक जीवन – Guru Teg Bahadur Ji Education and Early Life

गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय में जानें अपने बचपन में त्याग मल जी ने अपने भाई गुरदास जी से गुरमुखी, हिंदी और संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने बाबा बुद्ध जी से तीरंदाजी और घुड़सवारी का कौशल सीखा, और अपने पिता श्री गुरु हरगोविंद जी से उन्होंने तलवारबाजी का प्रशिक्षण प्राप्त किया।

बचपन में मात्र 13 वर्ष की आयु में गुरु तेग बहादुर जी ने अपने पिता के साथ मुगल सेनापति मुखलिस खान द्वारा 14 अप्रैल 1634 को किये गए हमले के विरुद्ध युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया और करतारपुर में घेराबंदी करके मुगलों से करतारपुर के सिक्खों की रक्षा की। इस युद्ध में मुखलिस खान मारा गया।

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इसी युद्ध में अपने पुत्र त्याग मल की वीरता और महान सैन्य पराक्रम देखकर उनके पिता गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने उन्हें “तेग बहादुर” की उपाधि से सुशोभित किया, तेग बहादुर का अर्थ है ‘बहादुर तलवार धारी’ और इसी के बाद से त्याग मल जी तेग बहादुर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय
श्री गुरु तेग बहादुर

गुरु तेग बहादुर जी का विवाह व व्यक्तिगत जीवन – Guru Teg Bahadur Ji Marriage and Personal Life

गुरु तेग बहादुर जी का विवाह छोटी उम्र में ही (लगभग 11 वर्ष ) 4 फरवरी 1632 को माता गुजरी से हुआ। विवाह के कुछ वर्षों बाद गुरुजी अपना ज्यादातर समय ईश्वर भक्ति और ध्यान लगाने में व्यतीत करने लगे। और समय बीतने के साथ उन्होंने स्वयं को समाज और लोगों से दूर कर लिया।

गुरु तेग बहादुर जी के पिता गुरु हरगोविंद सिंह जी ने 1644 में उन्हें आदेश दिया कि वे अपनी माता और पत्नी के साथ बाबा बकाला नामक स्थान पर जा कर रहें। गुरुजी बकाला चले गए तथा उस गांव में उन्होंने अपना अधिकांश समय एक भूमिगत कमरे में ध्यान लगाते हुए व्यतीत किया, यहां से उन्हें सिखों के नौवें गुरु के रूप में पहचाना जाने लगा।

गुरु तेग बहादुर जी की धार्मिक यात्राएं – Religious Journeys of Guru Teg Bahadur Ji

गुरु तेग बहादुर जी ने अपने बकाला प्रवास के दौरान बहुत यात्राएं कीं, अपनी यात्राओं के समय वे सिक्खों के 8 वें गुरु, गुरु हरकृष्ण जी से मिलने दिल्ली भी गए। श्री गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म प्रचार के लिए बहुत से स्थानों की यात्राएं कीं।

गुरुजी अपनी यात्राओं के दौरान आनंदपुर साहिब से रोपड़, किरतपुर, सैफाबाद (पटियाला) होते हुए खिआला (खदल ) पहुंचे यहां उन्होंने धर्म उपदेश दिए। उसके बाद वे दमदमा साहिब से होते हुए कुरुक्षेत्र गये । उसके बाद वे कड़ामानक पुर पहुँच गए, इसी स्थान पर उन्होंने साधु भाई मलूकदास का भी उद्धार किया। इन स्थानों के अतिरिक्त गुरु जी ने धर्म प्रचार हेतु पटना, बनारस, प्रयाग, असम आदि स्थानों की भी यात्रा की।

अपनी सभी यात्राओं के दौरान गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म प्रचार के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक व कल्याणकारी कार्य भी किये, उन्होंने मानव मात्र के उत्थान व कल्याण के लिए उन्हें सत्य और धर्म का ज्ञान दिया रूढ़िवादिता और अंधविश्वाश से दूर रहने व जीवन में उच्च आदर्शों को स्थापित करने पर जोर दिया।गुरु तेग बहादुर जी ने मानव मात्र के कल्याण एवं परोपकार के लिए धर्मशाला व कुएं बनबाना आदि कार्य किये।

गुरु तेग बहादुर जी के पुत्र गुरु गोविंद सिंह का जन्म -Guru Gobind Singh Birth

गुरु तेग बहादुर जी द्वारा की गई यात्राओं के दौरान जब वे 1666 में असम, बिहार आदि स्थानों की यात्रा कर रहे थे, उसी दौरान माता गुजरी को यात्रा करने में दिक्कत हो रही थी क्योंकि वे उस समय उम्मीद से थीं । तब 5 जनवरी 1666 को पटना साहिब में माता गुजरी जी ने एक पुत्र को जन्म दिया। गुरु तेग बहादुर जी के यही पुत्र कालांतर में सिक्खों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी कहलाये।

गुरु तेग बहादुर जी का साहित्यिक परिचय – Literary Introduction of Guru Teg Bahadur Ji

श्री गुरु तेग बहादुर जी धर्म गुरु के साथ-साथ एक विचारक और कवि भी थे, उन्होंने अपने जीवन काल में कई रचनाएं कीं जिनका संग्रहण श्री गुरु ग्रंथ साहिब में महला 9 में किया गया है। श्री गुरु जी ने अपनी रचनाएं सरल हिन्दी भाषा में रचित की हैं जिनमें ‘साखी’ और ‘पदों’ का प्रयोग किया गया है।

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गुरु तेग बहादुर जी ने अपना पूरा जीवन मानव के कल्याण व धर्म की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया और अंत में धर्म की रक्षा और मानव कल्याण के लिए अपने दो शिष्यों के साथ अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।

गुरु तेग बहादुर जी के श्लोक – Guru Teg Bahadur Teachings/Shlok

  • छोटे-छोटे कार्यों से मिलकर महान कार्य बनते हैं।
  • सभी प्रकार के जीवित प्राणियों के प्रति प्रेम, सम्मान भी अहिंसा है।
  • जीवन का विस्तार या संकुचन व्यक्ति के साहस के अनुपात में होता है।
  • विफलता कभी भी घातक नहीं हो सकती, उसी प्रकार सफलता कभी अंतिम नहीं होती। इनमें महत्वपूर्ण है साहस।
  • जब कोई आपसे प्रगाढ़ प्रेम करें तो ये आपको शक्ति देता है, और जब आप किसी से प्रगाढ़ प्रेम करें ये आपको साहस देता है।
  • निडरता दिलेरी नहीं बल्कि इस बात का निश्चय है कि डर से भी जरूरी कुछ काम है।
  • हार-जीत मनुष्य की सोच पर निर्भर है, यदि वह मान ले तो हार है और ठान ले तो जीत है।
  • सज्जन व्यक्ति वही है जो अनजाने में भी दूसरे की भावनाओं को ठेस न पहुंचाए।
  • प्रत्येक जीवित प्राणी के प्रति दया रखें, घृणा से ही विनाश होता है।
  • भय आपके दिमाग में होता है, और कहीं नहीं।यदि आपके पास गलतियों को स्वीकार करने का साहस हो, तो वे हमेशा क्षमा की जा सकती है।

श्री गुरु तेग बहादुर जी के कार्य – Tasks Done by Guru Teg Bahadur Ji

श्री गुरु तेग बहादुर सच्चे धर्म रक्षक, विचारक, शिक्षक, एक महान योद्धा के साथ-साथ एक कवि भी थे।अपने जीवन काल में उन्होंने कई रचनाएं कीं । गुरुजी की रचनाओं में 15 राग, 116 शबद तथा 782 अन्य रचनाएं हैं। गुरु तेग बहादुर जी की रचनाओं को श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संग्रहित किया गया है। गुरु जी की रचनाओं में मानव शरीर, मन, सेवा, मृत्यु, मानवीय संबंध और ईश्वर के बारे में विस्तार पूर्वक लिखा गया है।

गुरु तेग बहादुर जी ने श्री गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार करने के लिए बहुत सी यात्राएं कीं, यात्राओं के दौरान 1664 में गुरुजी ने तीन बार किरतापुर की यात्रा की। उन्होंने अपनी पहली यात्रा 21 अगस्त 1664 को की जिसमें वे सिखों के सातवें गुरु श्री हर राय जी की मृत्यु पर गए और उनकी पुत्री बीबी रूप से मिले। दूसरी बार वे सातवें सिख गुरु की माता बस्सी की मृत्यु पर गए। तीसरी बार वे उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप के माध्यम से लंबी यात्रा पर गए।

एक बार गुरु तेग बहादुर जी बिलासपुर की यात्रा पर गए और वहां की रानी चंपा से मिले। रानी चंपा ने गुरु तेग बहादुर जी को जमीन का एक टुकड़ा भेंट किया। गुरुजी ने भूमि के उस टुकड़े के लिए ₹500 का भुगतान करने की जिद की। बाद में उसी भूमि पर गुरु तेग बहादुर जी ने आनंदपुर साहिब नामक शहर की स्थापना की।

गुरु तेग बहादुर जी का 400 वाँ प्रकाश पर्व – 400th ‘Prakash Parv’ of Guru Teg Bahadur Ji

21 अप्रैल 2022 को सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी की 400 वीं जयंती दिल्ली के लाल किले पर आयोजित की गई। इस प्रकाश पर्व में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी भाग लिया, इस मौके पर उन्होंने एक डाक टिकट तथा स्मारक सिक्का जारी किया।

गुरु तेग बहादुर जी को गुरु पद मिलने की सम्पूर्ण कथा –

सिक्खों के आठवें गुरु श्री हरिकृष्ण राय जी को 1664 में चेचक की बीमारी ने जकड़ लिया जिसके कारण 30 मार्च 1664 को उनका निधन हो गया। मृत्यु से पूर्व उनसे यह जानने की कोशिश की गई कि उनका अगला उत्तराधिकारी कौन होगा, जिसके जवाब में उन्होंने केवल दो शब्द कहे ‘ बाबा’ और ‘ बकाला’। इन शब्दों का अर्थ निकाला गया कि अगले गुरु बकाला में मिलेंगे।

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अगले सिख गुरु के बकाला में मिलने की बात की चर्चा जब आम हो गई तो कई धोखेबाज बकाला में जाकर बस गए और अगला गुरु होने का दावा करने लगे, इससे वास्तविक गुरु को खोजने में बहुत कठिनाई होने लगी।

उसी दौरान की एक घटना है- एक धनी व्यापारी था जिसका नाम बाबा माखन शाह लबाना था। वह एक समुद्री तूफान में फंस गया, जिसमें उसका जहाज लगभग पलटने वाला था, तभी उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि यदि उसका जहाज सकुशल बच जाए तो वह 500 स्वर्ण मुद्राएं अपने गुरु को समर्पित करेंगे, उस वक्त उस व्यापारी को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनके गुरु श्री हरिकृष्ण राय जी का निधन हो चुका है।

मदद मांगने के बाद चमत्कारी रूप से व्यापारी का जहाज सकुशल बच गया, तब वह व्यापारी अपने गुरु श्री हरि कृष्ण राय जी से मिलने पहुंचा और उसे उनके निधन की दु:खद सूचना मिली । वहीं उसे इस बात की भी जानकारी हुई कि मृत्यु से पूर्व गुरु जी ने कहा था कि अगले गुरु बकाला में मिलेंगे।

वास्तविक गुरु की खोज में बाबा माखन शाह अगस्त 1664 में जब बकाला पहुंचे तब ऐसे 22 धोखेबाज लोग मिले जो वास्तविक गुरु होने का दावा करते थे। बाबा माखन शाह ने अपने मन्नत के अनुसार 500 स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन दिया था, परंतु उसने जानबूझकर उन धोखेबाज बाबाओं में से प्रत्येक को मात्र दो सोने के सिक्के दिए, जिन्हें लेकर सभी प्रसन्न होकर चले गए।

वास्तविक गुरु को ना पाकर व्यापारी माखन शाह बहुत निराश हुआ, तभी 10 अगस्त 1664 को उसे पता चला कि बकाला में तेग बहादुर नामक एक व्यक्ति अभी भी शेष है जो उन्हें नहीं मिले, अतः वह उनसे मिलने जाते हैं।

बाबा माखन शाह ने अन्य गुरुओं की तरह गुरु जी को भी दो स्वर्ण मुद्राएं दीं, 2 स्वर्ण मुद्राओं को देखकर गुरुजी ने व्यापारी से कहा “सिर्फ सोने के 2 सिक्के, परंतु आपने तो 500 मुद्राएं समर्पित करने का वचन दिया था” गुरु जी की बात सुनकर व्यापारी हतप्रभ रह गया, वह इस बात को समझ नहीं पा रहा था कि जब उसने ईश्वर को 500 स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन दिया था, तब वहां कोई दूसरा नहीं था, तो फिर इस बात की जानकारी कैसे हुई।

व्यापारी को असमंजस में देखकर श्री गुरु जी ने अपने कंधे से कपड़ा हटाकर उसे अपना घाव दिखाया और कहा ” देखो उस दिन मैंने ही तुम्हारे जहाज को धक्का देकर समुद्र में डूबने से बचाया था”। फिर बाबा माखन शाह ने श्री गुरु तेग बहादुर जी को 500 स्वर्ण मुद्राएं समर्पित कीं और जोर जोर से चिल्लाने लगा, ‘गुरु लाधो रे’ ( मुझे गुरु मिल गए हैं) और इस घटना के बाद श्री गुरु तेग बहादुर जी को सिक्खों का 9 वाँ गुरु घोषित कर दिया गया।

गुरु तेग बहादुर जी द्वारा धर्म की रक्षा हेतु महान बलिदान की शौर्य गाथा –

गुरु तेग बहादुर जी के समय देश में औरंगजेब का शासन था। औरंगजेब एक धर्मांध, अत्याचारी शासक था। वह अपने धर्म को सर्वोपरि समझता था तथा अन्य धर्म के लोगों को महत्व नहीं देता था। औरंगजेब के सलाहकारों ने उसे सलाह दी कि शेष सभी धर्मों के लोगों का धर्मांतरण करा कर उन्हें भी इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर करना चाहिए।

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औरंगजेब को यह सलाह पसंद आई और उसने सभी धर्म और जाति के लोगों को इस्लाम धर्म स्वीकार करने का ऐलान करवा दिया, इस कार्य को करने के लिए अपने खास लोगों का एक समूह नियुक्त कर दिया।उसका आदेश था कि सभी धर्म और जाति के लोगों को इस्लाम स्वीकार करना होगा अन्यथा उनका सिर कलम कर दिया जाएगा, इस कार्य के लिए पहले लोगों को लालच दिया जाता था, और ना मानने पर उन्हें प्रताड़ित किया जाता था।

औरंगजेब के प्रताड़ना और अत्याचारों से परेशान व भयभीत होकर कश्मीरी पंडित श्री गुरु तेग बहादुर जी के समक्ष गए और उन्होंने औरंगजेब के अत्याचारों तथा जबरन इस्लाम कबूल करवाने के बारे में उन्हे बताया।

उन्होंने गुरु जी को बताया कि उनकी बहू बेटी की इज्जत को भी खतरा है, तथा जब वे पानी भरने जाते हैं वहां पशुओं की हड्डियां, माँस और अन्य धर्म नष्ट करने वाली चीजें वहां फेंक देते हैं। तथा उन्हें अमानवीय तरीकों से प्रताड़ित किया जाता है। उन्होंने गुरुजी से विनती की कि आप हमारे धर्म और हमारी रक्षा करें।

गुरु तेग बहादुर जी के सामने जब कश्मीरी ब्राह्मण अपना दुख बता रहे थे, ठीक उसी समय गुरु तेग बहादुर जी के 9 वर्षीय पुत्र बाला प्रीतम ( गुरु गोविंद सिंह) आ गए, और उन्होंने भी लोगों की समस्याएं सुनीं और पिताजी से पूछा कि उन लोगों की सहायता करके कैसे उनको इस भय से छुटकारा दिलाया जा सकता है ?

गुरु जी के पिताजी ने जवाब दिया कि इनको इस परिस्थिति से छुटकारा दिलाने के लिए बलिदान देना होगा। तब श्री गुरु गोविंद जी ने अपने पिता श्री गुरु तेग बहादुर जी से कहा, मानवता के हित में इस कल्याणकारी कार्य को करने के लिए आपसे अधिक योग्य व्यक्ति कौन हो सकता है, धर्म की रक्षा हेतु यदि आपको ये बलिदान देना भी पड़े तो आप अपना बलिदान देकर भी इनके धर्म की रक्षा अवश्य करें।

इस प्रण के बाद गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों को कहा कि आप औरंगजेब तक मेरा ये संदेशा पहुंचा दो, उससे कहो कि, “गुरु तेग बहादुर जी हमारे गुरु हैं यदि वे इस्लाम कबूल कर लेंगे तो हम भी खुशी से इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेंगे। यदि गुरु जी ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया तो हम भी स्वीकार नहीं करेंगे, और न ही आप हम पर जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन के लिए अत्याचार करेंगे।”

औरंगजेब ने इस बात को स्वीकार करके अपने सैनिकों को गुरु जी को गिरफ्तार करने के लिए भेजा, परंतु उससे पहले ही गुरु जी स्वयं अपने 4 शिष्यों के साथ दिल्ली औरंगजेब के दरबार में पहुँच गए। औरंगजेब ने पहले गुरुजी को धर्मांतरण के लिए विभिन्न प्रकार के लालच दिए, और उनके न मानने पर उन पर विभिन्न प्रकार के अत्याचार करने शुरू कर दिए।

यहाँ तक कि गुरु जी को भयभीत करने के लिए उनके सामने ही उनके दो शिष्यों को बेहद दर्दनाक तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया। परंतु फिर भी गुरु तेग बहादुर जी टस से मस नहीं हुए और उन्होंने इस्लाम को स्वीकार नहीं किया, और औरंगजेब से कहा कि तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो, तुम्हारा इस्लाम भी इस बात की इजाज़त नहीं देता कि तुम दूसरे धर्म के लोगों को जबरन धर्मांतरण करा कर अपने धर्म में शामिल करो।

गुरु जी की बात सुनकर औरंगजेब आग-बबूला हो गया, और उसने गुरु जी का शीश काटकर उन्हें मृत्यदण्ड देने का हुक्म सुना दिया।

गुरु तेग बहादुर जी की गिरफ्तारी और चरवाहे की कथा –

औरंगजेब के द्वारा गुरु तेग बहादुर जी की गिरफ्तारी का आदेश देने के बाद, जब गुरु जी ने यह सुना तो उन्होंने अपनी पत्नी, भाइयों तथा शिष्यों के साथ श्री आनंदपुर साहिब के लिए यात्रा शुरू की। गुरुजी सैफाबाद (पटियाला ) में रुके। उसके बाद आगरा जाकर शहर के बाहरी क्षेत्र में रुके।

ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार उसी स्थान पर हसन अली नाम का एक चरवाहा बकरियां चराने के लिए आता था। वह चरवाहा हमेशा अल्लाह से यही दुआ मांगता था कि हिंदुओं को बचाने वाला व्यक्ति ( गुरु तेग बहादुर जी ) गिरफ्तार हो जाए, और वह चरवाहा ही उनकी गिरफ्तारी का कारण बने, जिससे उसे ₹500 का इनाम मिल जाए।

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उस स्थान पर गुरु जी ने उस चरवाहे को देखा, चरवाहा भूख से व्याकुल था, गुरुजी ने उसे बाजार से कुछ मिठाईयां लाने के लिए कहा जिससे कि वह अपनी भूख मिटा सके, गुरुजी ने मिठाइयां खरीदने के लिए उसे अपनी कीमती अंगूठी दे दी।

हसन अली चरवाहे ने बाजार से मिठाई खरीद कर बदले में उसने दुकानदार को अंगूठी दे दी, महंगी अंगूठी देखकर, दुकानदार को शक हुआ कि शायद यह अंगूठी चोरी की हो। हलवाई ने कोतवाली में इसकी सूचना दे दी । पुलिस ने चरवाहे को गिरफ्तार कर लिया। चरवाहा पुलिस को गुरुजी के पास ले गया। पुलिस ने गुरुजी से पूछा तुम कौन हो। गुरुजी ने जवाब दिया ” मैं हिंदुओं का उद्धारकर्ता हूं, मेरा नाम तेग बहादुर है”। जवाब सुनने के बाद पुलिस ने साथियों के साथ श्री गुरु तेग बहादुर जी को भी गिरफ्तार कर लिया।

और…. श्री गुरु तेग बहादुर जी धर्म की रक्षा के लिए शहीद हो गए –

मुख्य दरबार साहिब के नीचे भोरा साहिब में गुरु तेग बहादुर जी को आंखों पर पट्टी बांधकर 9 दिनों रखा गया। चरवाहे हसन अली को गुरु जी को गिरफ्तार कराने के एवज में ₹500 का इनाम दिया गया। उसके बाद गुरु तेग बहादुर जी, तथा उनके साथ गिरफ्तार किए गए उनके शिष्य भाई मतिदास और भाई दयालदास को लोहे के पिंजरे में डालकर भारी सुरक्षा के साथ दिल्ली ले जाया गया।

और वे 4 नवम्बर 1675 को दिल्ली पहुंचे । जहां उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार न करने के कारण यातनाएं दी गईं, फिर भाई मतिदास को आरे से चीर दिया गया और भाई दयाल दास को उबलते पानी की एक बड़ी कढ़ाई में डालकर मौत के घाट उतार दिया गया।

औरंगजेब के हुक्म के अनुसार 24 नवंबर 1675 को मुगल बादशाह का हुक्म न मानने के लिए दिल्ली के चांदनी चौक नामक स्थान पर गुरुजी का शीष काटकर उन्हें शहीद कर दिया गया। श्री गुरु तेग बहादुर जी की स्मृति में चांदनी चौक के उस शहीदी स्थल पर एक गुरुद्वारे का निर्माण किया गया जो आज भी गुरुद्वारा ‘श्री शीशगंज साहिब’ के नाम से प्रसिद्ध है।

दिल्ली में ही संसद भवन के निकट गुरुद्वारा ‘श्री रकाब गंज साहिब’ स्थित है, इस गुरुद्वारे का निर्माण 1783 में कराया गया था। इसी स्थान पर श्री गुरु तेग बहादुर जी का दाह संस्कार किया गया था।

हमें श्री गुरु तेग बहादुर जी के जीवन से शिक्षा लेनी चाहिए कि मानव कल्याण तथा मानव सेवा का भाव सबसे पहले होना चाहिए, साथ ही उन्होंने यह बताया कि धर्म मनुष्य के लिए बहुत महत्व रखता है, कोई भी धर्म छोटा या बड़ा नहीं होता बल्कि सब समान हैं, इसी धर्म की रक्षा के लिए गुरुजी ने स्वयं का जीवन बलिदान कर दिया।

वर्तमान में भी हमें उन्हीं के विचारों से प्रेरणा लेकर स्वयं के भीतर उस भावना को विकसित करना चाहिए, जिससे हम मानव सेवा तथा सभी धर्मों का सम्मान कर सकें। धर्म की रक्षा और मानव कल्याण के लिए गुरु जी के बलिदान ने हमारे देश में चिर काल से चली आ रही ‘ सर्वधर्म सम्भाव’ की संस्कृति को चरितार्थ किया और मजबूती प्रदान की, तथा लोगों को धार्मिक और अपने मौलिक विचारों की स्वतंत्रता के साथ निडरता से जीना सिखाया।

श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी के बाद उनकी विरासत –
  • श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी के बाद उनकी विरासत को उनके पुत्र गुरु गोविंद सिंह जी ने संभाला। वे सिक्खों के दसवें गुरु बने।
  • पिता की शहादत के समय गुरु गोविंद सिंह मात्र 9 वर्ष के थे अतः इस घटना ने उनके अंतःस्थल पर गहरा प्रभाव डाला। परिणामस्वरूप बड़े होकर उन्होंने सिक्खों को संगठित किया।
  • उनमें बहादुरी और आत्मरक्षा जैसे गुणों का विकास करने पर जोर दिया।
  • और फिर उन्होंने ‘खालसा-पंथ’ का निर्माण किया।
  • देश में विभिन्न स्थानों पर और विशेष रूप से पंजाब में गुरु तेग बहादुर जी के नाम पर कई अस्पतालों व शिक्षण संस्थानों के नाम रखे गए।

श्री गुरु तेग बहादुर जी से जुड़े 10 महत्वपूर्ण तथ्य – 10 Important Facts Related to Shri Guru Teg Bahadur Ji

  • श्री गुरु तेग बहादुर जी सिक्ख धर्म के 9 वें गुरु थे।
  • श्री गुरु तेग बहादुर जी के द्वारा रचित 115 पद्य श्री गुरु ग्रंथ साहिब के महला 9 में संग्रहित हैं।
  • श्री गुरु तेग बहादुर जी के पिता श्री गुरु हरगोविंद सिंह सिक्ख धर्म के छठवें गुरु थे।
  • सिक्खों के आठवें गुरु श्री हरिकृष्ण राय जी की मृत्यु के बाद गुरु जी को 20 मार्च 1664 को सिक्खों का नौवां गुरु बनाया गया और ये 24 नवम्बर 1675 तक गुरु की गद्दी पर आसीन रहे।
  • श्री गुरु तेग बहादुर जी ने आनंदपुर साहिब तथा पटियाला का निर्माण कराया था।
  • इनका वास्तविक नाम त्याग मल था। इन्हें तेग बहादुर नाम इनके पिता ने दिया जिसका अर्थ है तलवार का धनी।
  • मानव कल्याण तथा धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के कारण इन्हें ‘हिन्द दी चादर’ कहा जाता है।
  • गुरु तेग बहादुर जी का विवाह 4 फरवरी 1632 को माता गुजरी से हुआ।
  • इस्लाम धर्म स्वीकार न करने के कारण मुगल शासक औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक में गुरुजी का शीष कटवा कर उन्हें शहीद कर दिया।
  • चांदनी चौक में शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा श्री शीशगंज स्थित है तथा इनके दाह संस्कार वाले स्थान पर गुरुद्वारा श्री रकाब गंज स्थित है जो श्री गुरु जी की शहीदी का स्मरण कराते हैं।

FAQ

प्रश्न – गुरु तेग बहादुर जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था ?

उत्तर – गुरु तेग बहादुर का जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था।

प्रश्न – गुरु तेग बहादुर जी के जीवन से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?

उत्तर – गुरु तेगबहादुर जी ने आध्यात्मिक, आर्थिक, सामाजिक विकास के लिए अनगिनत कार्य किए। रूढ़ियों, और अंधविश्वासों से दूर रहने को कहा, कुएँ खुदवाना, धर्मशालाएँ बनवाना आदि कार्यों के अलावा वे धर्म के सच्चे रक्षक थे।

प्रश्न – गुरु तेग बहादुर के त्याग और बलिदान के लिए उन्हें क्या कहा जाता है ?

उत्तर – श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहादत इतिहास में अमर है। वह एक महान योद्धा थे जिन्होंने मातृभूमि, धर्म और लोगों के कल्याण के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। इसलिए उन्हें ‘हिंद दी चादर’ कहा जाता है।

प्रश्न – गुरु तेग बहादुर कैसे शहीद हुए थे ?

उत्तर – इस्लाम धर्म स्वीकार न करने के कारण मुगल बादशाह औरंगजेब ने दिल्ली के चाँदनी चौक पर उनका शीश कटवा दिया था।

प्रश्न –गुरु तेग बहादुर जी ने अपना बलिदान क्यों दिया ?

उत्तर – धर्म की रक्षा के लिए

प्रश्न -गुरु तेग बहादुर शहीद दिवस कब मनाया जाता है ?

उत्तर – 24 नवम्बर

प्रश्न -गुरु तेग बहादुर के तीन सहयोगी बलिदानी कौन थे ?

उत्तर – भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला।

प्रश्न -दिल्ली में कौन सा स्थान गुरु तेग बहादुर के बलिदान से जुड़ा है ?

उत्तर – दिल्ली के चांदनी चौक में स्थित गुरुद्वारा श्री शीशगंज साहिब श्री गुरु तेग बहादुर के बलिदान की याद दिलाता है।

प्रश्न -औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को क्यों मारा ?

उत्तर – औरंगजेब ने इस्लाम धर्म स्वीकार न करने के कारण गुरु तेग बहादुर जी को मृत्युदंड दिया।

प्रश्न – 24 नवंबर को कौन सा शहीद दिवस है ?

उत्तर – 24 नवंबर को गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस होता है।

प्रश्न – गुरु तेग बहादुर ने हिंदुओं को कैसे बचाया ?

उत्तर – गुरु तेग बहादुर ने अपने जीवन का बलिदान देकर हिंदुओं को बचाया।

प्रश्न – गुरु तेग बहादुर ने हमें क्या सिखाया ?

उत्तर – गुरु तेग बहादुर ने हमें सच्चाई, मानव कल्याण, तथा धर्म की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना सिखाया।

प्रश्न – गुरु तेग बहादुर जी को मूल रूप से क्या कहा जाता था ?

उत्तर – गुरु तेग बहादुर जी को मूल रूप से ‘हिंद दी चादर’ कहा जाता है।

प्रश्न – गुरु तेग बहादुर जी ने अपनी शहादत से पहले क्या स्वीकार करने के लिए नहीं कहा था ?

उत्तर – दूसरी बहादुर जी ने अपनी शहादत से पहले इस्लाम स्वीकार करने के लिए मना किया था।

प्रश्न – क्या गुरु तेग बहादुर की शिक्षा आज भी प्रासंगिक है ?

उत्तर – जी हां, गुरु तेग बहादुर की शिक्षाएं लगभग 400 वर्ष बाद आज भी प्रासंगिक हैं।

प्रश्न – गुरु तेग बहादुर जी के समय कश्मीर का गवर्नर कौन था ?

उत्तर – गुरु तेग बहादुर जी के समय कश्मीर का गवर्नर इफ्तार खां था।

हमारे शब्द – Our Words

दोस्तों ! आज के इस लेख गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय | गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2022 में हमने आपको  गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय के बारे में वृहत जानकारी उपलब्ध कराई है , हमें पूर्ण आशा है कि आपको गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय पर यह जानकारी और यह लेख अवश्य पसंद आया होगा। यदि आप में से किसी भी व्यक्ति को इस लेख से संबंधित कुछ जानकारी अथवा सवाल पूछना हो तो कमेंट बॉक्स में कमेंट करके हमसे पूछ सकते हैं।

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